v ____मजबूरी____


बात उन दिनों की है जब मैं सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के क्षेत्रिये कार्यालय(तत्कालीन मण्डल कार्यालय) मुजफ्फरपुर में ज्वाइन किया था। ज्वाइनिंग के अगले साल यूनियन बीपीसीबीआईईए का कॉन्फ़्रेंस होना था, तो यूनियन के महासचिव द्वारा कहा गया कि यूनियन का सोवेनियर छपवाना है। उसके लिए एक कविता लिखो सोवेनियर में छपवावेंगे। दरअसल उन्हें पता चल गया था कि मैं कविता लिखता हूँ। उनके आग्रह के दो दिनो के अंदर मैंने यह कविता लिखकर उन्हें सौंप दिया और बिना किसी बदलाव या संशोधन के यह कविता सोवेनियर में छप गई। सोवेनियर की एक प्रति आज भी मेरे पास है। प्रस्तुत है वह कविता जिसे यूनियन द्वारा काफी सराहा गया था। मैंने कविता का शीर्षक दिया था – “मजबूरी”

___ मजबूरी__

लोग कहते हैं, मजदूर हैं हम।

मैं कहता हूँ, मजबूर हैं हम ।।

बर्बस,

मिटा लेने को,रोटी के चंद टुकड़ों से-

घंटों से सताता, अपना भूखापन ।

ढँक लेने को,काँपती हथेलियों से-

चिथड़ों से झाँकता अपना नंगापन ।

लोग कहते हैं, मजदूर हैं हम।

मैं कहता हूँ, मजबूर हैं हम ।।

जबरन,

भर लेने को अन्न के चंद दानों से-

दिन भर की कमाई, अंजुरी में ।

काट लेने को, अपने ही सख्त दांतों से-

विरोध में फड़कते होंठ, मजबूरी में।

लोग कहते हैं, मजदूर हैं हम ।

मैं कहता हूँ, मजबूर हैं हम ।।

उठा लेने को मशाल,

इस मजबूरी के खिलाफ !

छेडने को जेहाद ,

इस गुंगेपन के खिलाफ !

लोग कहते हैं, मजदूर हैं हम ।

मैं कहता हूँ, मजबूर हैं हम ।।

:--- मोहन”मधुर”

(सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के बीपीसीबीआईईए यूनियन के सोवेनियर में 1983 में प्रकाशित)

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