#जीवन दायनी गंगा#


भारत में बहने वाली सभी नदियों में पावन व श्रेष्ठ नदी गंगा हमारी सभ्यता एवं संस्कृती की अमर गाथा सँजोये हुए अनादि काल से अनवरत बहती आ रही, हमें आतिशय गौरव प्रदान करती है। वैसे तो प्रकृती का यह अनुपम उपहार,उत्तराखंड,उत्तरप्रदेश,बिहार,झारखंड होते हुए पश्चिम बंगाल तक को प्राप्त है और देश से बाहर बांग्लादेश को भी।

इसकी उत्पत्ति गोमुख से होती है जो गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है। यह स्थान तिब्बत बोर्डर से 35 किलोमीटर की दूरी पर है। गांगोत्री ग्लेशियर हिमालय का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। यह ग्लेशियर 30 किलोमीटर लंबा और 2 से 4 किलोमीटर चौड़ा है।यह स्थान उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में पड़ता है। उद्गम स्थान से लेकर देवप्रयाग तक यह भागीरथी नदी के नाम से जानी जाती है। भागीरथी गोमुख से टेहरी डैम होते हुए देवप्रयाग तक पहुँचती है,अलकनंदा नदी सतोपंथ ग्लेशियर से निकलकर बद्रीनाथ होते हुए देवप्रयाग पहुँचती है। जहां भागीरथी और अलकनंदा नदी मिलकर इसका नाम गंगा कहलाने लग जाता है।

विष्णुप्रयाग—यहाँ अलकनंदा नदी धौलीगंगा नाम की नदी से मिलती है।

नंदप्रयाग—यहाँ नदी अलकनंदा नदी नन्दाकिनी से मिलती है।

कर्णप्रयाग—यहाँ नदी अलकनंदा नदी पिंडार से मिलती है ।

रुद्रप्रयाग—यहाँ नदी अलकनंदा नदी मंदाकिनी से मिलती है।

देवप्रयाग—जैसा ऊपर बताया गया,यहाँ अलकनंदा नदी भागीरथी नदी से मिलती है।

तो देवप्रयाग से शुरू होता है हमारी पावन नदी गंगा का सफर। हिमालय की संकरी घाटियों के लगभग 256 किलोमीटर लंबे सफर के बाद ऋषिकेश में गंगा अपने पूर्ण स्वरूप को धारण कर मैदानी भाग में उतरती है जो हरिद्वार तीर्थ स्थल से शुरू होता है।


गंगा जल संग्रहण एवं निकासी के मामले में पूरी पृथ्वी पर अम्ररीका के अमेज़न और अफ्रीका के कोंगों नदी के बाद तीसरी सबसे बड़ी नदी है। यह हरिद्वार से बढ़ते हुए कासगंज कन्नौज,फर्रुखाबाद,कानपुर शहरों से होकर रास्ते में रामगंगा नदी से मिलती है। आगे बढ्ने पर यह इलाहाबाद(अब,प्रयागराज) में यमुना नदी से मिलती है इस मिलन स्थल को त्रिवेणी संगम के नाम से भी जाना जाता है। जो हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। यहाँ कुम्भ मेला हर 12 साल पर लगता है। यहाँ बता दें कि यमुना नदी से जल का प्रवाह गंगा की अपेक्षा ज्यादा है। इसके बाद मध्य प्रदेश के कैमूर की पहाड़ियों से निकल कर आने वाली नदी तमसा गंगा से सिरसा (यूपी) में मिलती है। इसके आलवे नेपाल से आने वाली अनेक नदियों (त्रिबूटेरिज)से भी गंगा का जलग्रहण होता है। फिर गंगा उत्तरप्रदेश के ही मिर्ज़ापुर,वाराणसी,गाजीपुर,बलिया,नरोरा शहरों से गुजरते हुए बिहार में छपरा,सोनपुर (जहां गंगा और बुढ़ीगंडक नदी का संगम है),होते हुए ,हाजीपुर,पटना,मुंगेर आदि शहरों से गुजरते हुए झारखंड के साहिबगंज के बाद पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।जहां इसे भागीरथी डिस्ट्रीबयूटरी का (कृत्रिम) रूप दिया गया है और यह मुर्शिदाबाद,पलासी,नाबाद्वीप (जहां श्री चैतन्यमहाप्रभु की जन्म स्थली है),आदि टाउनशिप से गुजरती है। कोलकाता में यह गंगा हूगली नदी(कृत्रिम डिस्ट्रीबयूटरी) के रूप में जाना जाता है। हमारी गंगा इसके बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती है जिसकी सीमा कोलकाता से लगभग 50 किलोमीटर दूरी पर है। ततपश्चात यह बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है,जहां विश्व के सबसे बड़े रिवर डेल्टा का निर्माण होता है। बांग्लादेश में इसे पद्मानदी के नाम से जाना जाता है। गंगा अपने उद्गम से अंत तक कुल 2525 किलोमीटर की यात्रा तय करती है। गंगा अपनी इस लंबी यात्रा के क्रम में 30 से 40 करोड़ लोगों को जीवन प्रदान करती है जो गंगा बेसीन में बसते हैं। यद्यपि गंगा का जल विशेष माना जाता रहा है लेकिन लंबे समय से विभिन्न सिद्धान्त इस पर प्रसारित किए गए हैं जिनमें से कोई भी निष्कर्ष के रूप में अब तक मान्य नहीं हो पाया है। परंतु इस मिथक को दूर करने के लिए मोदी सरकार द्वारा 150 करोड़ की लागत की परियोजना कार्यरत है जो इसकी वैज्ञानिकता प्रतिपादित करने में लगी है। जो यह स्पष्ट करेगी कि गंगा-जल का कोई औषधीए-गुण है या नहीं जो विभिन्न बैक्टीरिया या जीवाणुओं को नष्ट करते हैं जिसके कारण इसका उपयोग मनुष्य के स्वस्थ और पवित्र जीवन के लिये किया जाता रहा है। वैसे युगों से ऐसी मान्यता रही है कि गंगा का जल लंबे समय तक रखने के बाद भी सड़ता नहीं या कोई जीवाणु इसमें उत्पन्न नहीं होते और इस मान्यता पर अबतक कोई संदेह नहीं है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि गंगा के किनारे औषधीए पौधों की खेती होती रही है।

परन्तु,गंगा हमारे कारणो से अब, अपनी पवित्रता खोती हुई नजर आने लगी है। यह विश्व की सबसे अधिक प्रदूषित(पोल्लुटेड) नदियों में से एक हो गई है। इसमें इसके किनारे बसे हुए शहरों की गंदी नालियां, कल-कारखानों की गंदगियाँ प्रवाहित की जा रही है। मानव एवं जानवरों की लाशें इसमें बहाई जाने लगी हैं। इसवर्ष 2021में तो हद की सीमा तब पार हो गई जब सैंकड़ों व हजारों की संख्या में कोरोना ग्रसित मृतकों की लाशें गंगा में बहती हुई देखी गई। इन सड़ी-गली लाशों को देखकर रोंगटे खड़ी करने वाली तसवीर समाचार-पत्रों और सोसल मिडिया पर प्रसारित होने लगे। इस कारण कहीं कहीं,तो गंगा का पानी इतना अधिक दूषित हो गया है कि इसमें स्नान तक करना सुरक्षित नहीं लगता।


एक तरफ प्रदूषण के कारण प्रदूषित जल,दूसरी तरफ ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के ग्लेशियारों के पिघलते जाने के खतरे के कारण लंबे समय तक जलश्रोत की अनुपलब्धता के डर से हमारी इस जीवनदायनी गंगा का भविष्य खतरे में दिखाई देने लगा है। यदि ऐसा होता है तो फसलों की सिंचाई के लिए जल की कमी, जलस्तर के गिरने का खतरा बढ़ जाने से पीने के पानी की कमी जैसे अनेक समस्याओं से हम घिर जाएंगे। जो अंततः मानवता के लिए भी खतरा साबित होगा।

अतः हम समस्त मानव जाति की रक्षा के लिए गंगा ही क्यों समस्त नदियों को प्रदूषण से बचाना होगा, ग्लोबल वार्मिंग से बचाव के उपायों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। यह केवल सरकार और विदेशों पर ज़िम्मेदारी थोपने से नहीं हो सकता । इसके लिए जन-जागरण के अभियान से एक एक ब्यक्ति को जोड़ना,लोगों में जागरूकता पैदा करना,वनो के विकास के लिए पौधा/वृक्ष रोपण कार्य क्रमों में सामाजिक हिस्सेदारी व सहभागिता की भावना व उत्साह पैदा करना अति आवश्यक है।


:-- मोहन”मधुर”

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