#होली— कोयल की कूक या पपीहे की हूक#



#होली— कोयल की कूक या पपीहे की हूक#

बासन्ती उपवन में छायी बहार है

मन्द मन्द चलती मादक बयार है

अपनों का संग है तो होली हूड़दंग है

प्रेम का तरंग है तो मन में उमंग है

मित्रों की टोली है तो मन में ठिठोली है

युवकों की टोली है तो रंगों की होली है

गीतों की गूंज ने मन को भिंगो ली है

जब ऐसी होली है तो कोयल की कूक है

जब अपनों से दूरी हो, गर कोई मजबूरी हो

मन में उमँग नहीं, दिल में तरंग नहीं

तो समझो होली में रंग नहीं

हाल जब ऐसा हो, जेब में न पैसा हो

तो होली क्या ? दिवाली क्या ?

कोयल की कूक भी पपीहे की हूक है !

कोयल की कूक भी पपीहे की हूक है !

:---- मोहन “मधुर”


आज होली का त्योहार हम सबों के लिए कितनी खुशियाँ लेकर आया है । वैसे तो होली प्रत्येक वर्ष आती है। परंतु हम सबों के लिए पिछली दो होली मात्र मुंह चिढ़ाती ठिठोली बन कर रह गई । कारण हम सभी जानते हैं कोरोना ने हमारी अर्थ ब्यवस्था ही नहीं हमारी संस्कृति की विरासत को भी भीषण ठेस पहुंचाया है। लाखों घरों की रोजी रोटी छिन गई । लाखों के घर के चिराग बुझ गए। हज़ारों हजार संस्थान उजड़ गए । बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि और अपनों को खोने वाले परिवारों के दर्द ने हम सभी को हिला कर रख दिया । इसके बाद आई यह होली एक तरफ अत्यधिक खुशियों के इज़हार का शबब बना है तो दूसरी तरफ हम उनके दर्द को भी नहीं भूल सकते जिनके अपने उनसे सदा के लिए दूर हो गए और जिन्होने अपनी रोज़ी रोटी को खो दिया । उनके दिल में बैठ कर हम सोचें तो यह होली उनके लिए कोयल की मधुर राग नहीं पपीहे की करुण पुकार ही है जो अपने बिछुड़े के लिए कहाँ कहाँ की रट लगा रही है। इस दर्द के साथ वैसे सभी भारत वासी के लिए यह कविता समर्पित है जो ऐसे दर्द से आहत हैं।

:-- मोहन "मधुर"

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