सरस्वती पूजा और मूर्तिकार

Updated: Feb 5


हमारा देश धर्म प्रधान है। हमारे यहाँ विभिन्न अवसरों पर पूजा एवं त्योहार मनाए जाते हैं। माँ सरस्वती विद्या एवं कलाओं की देवी मानी जाती हैं। तभी तो उनके एक हाथ में किताब और दूसरे हाथ में वीणा धारण किए हुए मूर्ति की हम पूजा करते हैं। हमारे यहाँ मूर्तियाँ मिट्टी की बनाई जाती हैं। जिसे शिल्पकार अपने हाथों से महीनों पहले से बनाना शुरू कर देते हैं। मूर्ति सभी प्रकार की मिट्टी से नहीं बनती। सबसे पहले वे योग्य मिट्टी की ब्यावस्था करते हैं। मिट्टी को बड़ी मेहनत से कितने दिनों तक गूँथ कर तैयार करते हैं। उसके बाद बांस और लकड़ी के साथ धान के पुआल के सहारे अपनी कल्पना के अनुसार एक आकार तैयार करते हैं फिर उनपर मिट्टी का लेप चढ़ाकर उसपर मोटे आकृतियों को उकेरा जाता है। पुनः और मिट्टी के प्रयोग से महीन आकृतियों को सजाते हैं। इस क्रम में तैयार होते हुए प्रतिमाओं को सुखा सुखा कर आगे का काम बढ़ाया जाता है। मिट्टी का काम समाप्त होने और प्रतिमा के पूरी तरह सूख जाने के बाद ही रंगों और कुचियों का कम शुरू होता है। इस पूरे कार्य में कलाकार की लगनशीलता, कल्पनाशक्ति,धैर्य और कड़ी मेहनत के फलस्वरूप ही सुंदर सुंदर मूर्तियाँ तैयार हो पाती हैं। कलाकार अपनी कल्पना के एक एक तार को जोड़ता है तभी प्रतिमा में ऐसा प्राण फूँक देता है कि साधक के मन में आराधना के भाव उमड़ पड़ते हैं और वह साक्षात देवी माँ के आगे अपने को समर्पित भाव से खड़ा देख पाता है। यह काम कितना बड़ा है कि मिट्टी में प्राण फूँक कर उसे देवता बना देना और ऐसा कि देखते ही श्रद्धा और विश्वास के भाव उमड़ पड़े। यहाँ मूर्ति बनाने वाले की साधना पूजा करने वाले की साधना से बड़ी महसूस होती दिखती है। अंतर केवल साधक के मन की कामना से है। जहां मूर्तिकार उसमें अपनी लगन इसलिए दिखाता है कि उसे अधिक से अधिक कीमत मिले। वहीं दूसरी तरफ पूजा करने वाले की कामना रहती है कि विद्या की देवी माता सरस्वती उसे विद्या-धन से परिपूर्ण कर दें।

हम जरा सोच कर देखते हैं तो हम पाते हैं कि कला और पठन-पाठन की विद्या दोनों विद्याएँ देनेवाली शक्ति, माँ सरस्वती ही हैं। मूर्तिकार के पास कला है लेकिन धन की कमी है सरस्वती की साधना वह भी करता है लेकिन धन के लिए। फिर भी हम देखते हैं कि समाज में उसकी स्थिति न तो धन के मामले में न ही सम्मान के मामले में अच्छी है। ऐसा क्यों? हमने कभी सोचा है? भारत की संस्कृति कला के मामले में बहुत धनी रही है। यहाँ के पुराने मंदिरों और ताजमहल जैसे पुरानी धरोहरों से यह उजागर हो चुका है कि यहाँ की कला संस्कृति बहुत पहले से ही विकसित रही है। तो कलाकारों के प्रति इतनी उपेक्षा क्यों?


मैं संध्या की सैर के लिए जिस तरफ जाता हूँ, उधर हरिजन गरीबों की छोटी बस्ती है उसी बस्ती में कुछ मूर्तिकारों को आजकल मूर्तियाँ बनाते देखता हूँ। उनके पास खुद के रहने के लिए ढंग की ब्यावस्था नहीं है। पोलिथीन से बनी छतरी के नीचे आज की वारीश में दयनीय स्थिति में रंगो और कुचियों के सहारे वे प्रतिमा को अंतिम रूप दे रहे थे, तो मेरे मन में यह खयाल आया जिसे मैं अपने इस ब्लॉग में आपके समक्ष प्रस्तूत कर दिया। अब, जरा सोचें, हमारी सामाजिक स्थिति कैसी है? हम चाँद और मंगल ग्रहों पर जाने को सोच रहे हैं लेकिन अपने इस प्रकार के सुरागों को नहीं देख रहे। हम या हमारी सरकारें जो भी करती हैं,उसमें सबसे पहला हक उन गरीबों के लिए बनता है जो सबसे अधिक मजबूर हैं और समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े हैं। जरा विचार करें........... ।

:-- मोहन”मधुर”

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