समय के साथ खुद को बदलें (भाग—2)



इस बदलते परिवेश में प्रभावी होने के लिए अनेक प्रकार की नयी क्षमताओं के विकास की आवश्यकता है। मैं तकनीकी क्षमता की बात नहीं कर रहा हूँ। बल्कि मेरा तात्पर्य स्व प्रबंधन से है। ये हैं सहज बोध, स्वयं को मोड़ने की सहजता यानि(flexibility),स्पष्ट सोच, सहनशीलता इत्यादि। इनकी प्राप्ति किसी अन्य के माध्यम से नहीं हो सकती, इसे स्वयं अपने अंदर से विकसित करना होगा।

स्वयं को समय के साथ बदलने की आवश्यकता को एक छोटी सी कहानी से समझ सकते हैं जो मैंने कहीं पढ़ा था। एक मछलीघर (ऐक्वैरियम) मे एक मछली मस्ती करती हुई तैरती थी। उस मछलीघर के एक कोने से एक बच्चा हर रोज खाना अंदर डालता था। वह मछली उस खाने को अपने मुंह मेँ लेकर फिर तैरने लग जाती थी। कुछ दिनों तक ऐसा करने के बाद मछली इस प्रक्रिया मेँ अभ्यस्त हो गई। बच्चे तो स्वभाव वश शरारती होते ही हैं। उस बच्चे के मन में भी शरारत आई और उसने एक पारदर्शी शीशा लेकर खाना और मछली के बीच डाल दिया। अब, जैसे ही खाना लेने के लिए मछली कोने में आती,उसकी नाक उस शीशे से टकरा जाती। वह समझ नहीं पाती कि खाना दूर क्यूँ रह जाता है। अनेक बार कोशिश करने के बाद अंत में वह समझती है कि उसे अब खाना नहीं मिलेगा। अब वह उस कोने में जाना छोड़ देती है। यह देख बच्चे को दया आती है और वह उस शीशे को निकाल देता है और खाना डालता रहता है।मछली खाने को देखती है परंतु, उस कोने में नहीं जाती है। दूसरी मछलियाँ देखती है कि उस तरफ़ बहुत सारा खाना पड़ा है तो सारा खाना उठा कर वे चल देती हैं। एक दिन ऐसा आता है कि वह पहले वाली मछली मर जाती है।

आखिर वह मछली मरती क्यूँ है? उसकी मृत्यु का कारण उसका अनुभव था कि उसे खाना मिलेगा ही नहीं।

इस संसार में कुछ लोग भी उस मछली की तरह हैं जो एक ही तरह से काम करने के आदि बन गए हैं और अपने समय में उस तरीके को अपना कर सफल भी हुए । परंतु,बदलते समय के साथ उनहोंने खुद को बदलने की कोशिश नहीं की | वे उसी पुराने तरीके से काम करना चाहते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप असफलता हाथ लगती है। उनके समझ में उस मछली की भांति यह नहीं आता कि बीच में कौन सा शीशा है? परिणाम स्वरूप वे मेहनत करना छोड़ देते हैं। कुछ समय बाद कोई और ब्यक्ति किसी अन्य सरल तरीके को अपनाकर उसी कार्य में सफलता हासिल कर लेते हैं। पहले वाले ब्यक्ति में हताशा आ जाती है। इसतरह उसके पुराने अनुभव ही उनकी प्रगति में बाधक साबित होती है।

इसलिए स्वयं को बदलते परिवेश के साथ अपने साहस,विवेक,परिपक्वता का सहारा लेते हुए बदलाव को स्वीकार करें और उत्साहित होकर नए हौसले के साथ आगे की योजना तैयार करें और जीवन में आगे का मार्ग प्रशस्त करें।

बदलाव हमारी पूंजी है इस मंत्र को हमें मान लेना चाहिए।

;--- मोहन “मधुर”

53 views2 comments