समय के साथ खुद को बदलें (भाग—1)



समय बहुत तेज़ी से बदल रहा है। इस परिस्थिति में हमे अपने आप को बदलना जरूरी है। हमें समय के साथ चलना होगा। अन्यथा समय और समाज हमें निचोडे गए नींबू की तरह किनारे फेंक देगा। इसके लिए हमें अपनी सूझ बुझ की खिड़की खुली रख कर यानि चौकन्ना होकर जीना पड़ेगा। हमें बदलती सोच बदलते विचारों पर अपनी समझ बनानी होगी। हम हर समय पुरानी विचारधारा पुरानी सोच को लेकर आगे नहीं बढ़ सकते।

एक समय था जब कम्प्यूटर नहीं था सारे काम मनुष्य अपने हाथों से मैनुअली करता था। फिर कम्प्युटर आया और जिन संस्थाओं ने इसे अपनाया उसका विकास तेज गति से हुआ। जो पिछड गया पिछड्ता ही चला गया।

कहते हैं ये दुनिया बदलती है,इसी का नाम दुनिया है। पहले सवारी बैलगाड़ी थी नाव था रेगिस्तानी इलाके में ऊँट की सवारी होती थी। आज बैलगाडी से बदलते बदलते बस और कार मेट्रो रेल और हवाईजहाज की सवारी आम हो गयी है और अब तो बुलेट ट्रेन भी।



हम सभी पहले पहल इसे अपनाने से डरते रहे हैं परन्तु बाद में उसको स्वीकार करते चले गए। नाव की जगह मोटरबोट ने ले लिया। ये सभी हमारी ज़िंदगी को आसान बनाते चले गए। पहले हमें दूर रहने वाले रिशतेदारों तक समाचार या अपनी बात मात्र पत्र द्वारा कबूतर या बाज जैसे पक्षियों के सहारे या आदमी भेजकर पहुंचाना पड़ता था। फिर डाक द्वारा इसे आसान बनाया गया।फिर टेलीफोन आया मोबाइल कौलिंग भीडिओ कॉलिंग अब देखिये कम्प्युटर युग का कमाल सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के जरिये दूर बैठे लोगों को हम मेल द्वारा पत्र सेकेंडो में भेज देते हैं। इतना ही नहीं 100-500 लोगों की वेर्चुअल बैठक (meeting) कर विचारों का आदान प्रदान इस प्रकार कर लेते हैं कि लगता ही नहीं कि हम एक दूसरे से हजारों कोस दूर बैठे हैं।ये सभी बदलाव हम सभी मंजूर करते चले आ रहे हैं। जिसका नतीजा आज यहाँ तक पहुँच गया है कि हमें जेब में बिना नकद रखे ही सारा बाज़ार खरीद कर घर ले आने में कोई कठिनाई नहीं होती। पेटिएम गूगल-पे जैसे ऐप ने इसे इतना आसान कर दिया है। कहने का मतलब है हम जो भी बदलाव स्वीकार करते चले गए उसका नतीजा हमारे सामने है। जो हमारी ज़िंदगी को आसान और सुगम बनाते चले गए हैं। अर्थात समाज के भले के लिए परिवर्तन लाना जरूरी है।

( क्रमशः......) शेष अगले भाग में।


:--मोहन "मधुर"

89 views5 comments