श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और हम



आज पंजाब में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के अवसर पर सरकारी कार्यालयों में अवकाश है। मैं जहां रहता हूं जलन्धर के उस सोसायटी में कल रात श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का जागरण मनाया गया। सोसायटी के पार्क में इसका आयोजन किया गया था। यह कार्यक्रम कल देर रात तक चलता रहा। सोसायटी की चहारदिवारी भक्ति रस में सराबोर हो रही थी। भक्ति मय संगीत व भजन का देर रात तक चलते कार्य क्रम की गूंज चहारदिवारी में स्थित चौदह मंजिली एपार्टमेंट्स की ऊंचाईयों से टकराकर आती हुई वातावरण को आह्लादित कर रही थी। इन सब के बीच थोड़ी देर आनंदित होने के पश्चात् स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए बिस्तर पर जाने का मैंने निर्णय लिया।

परन्तु बिस्तर पर जाने के बावजूद मेरे मन में कुछ विचार चलते रहे। इन विचारों से सम्बंधित प्रस्तुति

नीचे वर्णित है:--

हमारा देश भारत एक धर्म प्रधान देश माना जाता है। कहा जाता है, जब जब यहां धर्म का अपमान होता है। भगवान स्वयं अवतरित होकर धर्म की रक्षा करते हैं। इसी क्रम में महाभारत की कथा है जिसमें कहा गया है कि आतताईयों का विनाश कर धर्म की स्थापना हेतु श्रीकृष्ण को अवतरित होना पड़ा था। जब महाभारत की लड़ाई हुई थी तो लड़ाई की शुरुआत के क्रम में अर्जुन मोह-वश अपने बन्धु-बान्धवों को लक्ष्य कर गाण्डीव नहीं उठा पा रहे थे। तो उनके सारथी श्रीकृष्ण द्वारा युद्ध के मैदान में ही अपना साक्षात्कार कराते हुए दिव्य ज्ञान का दर्शन दिया गया था।इसी दर्शन के लिपी बद्ध शास्त्र का नाम गीता है। हमारे देश की पुरानी सम्पूर्ण संस्कृति इसी दर्शन के इर्दगिर्द घूमती दिखाई देती है। परन्तु समय के बदलाव के साथ इस संस्कृति में परिवर्तन होते गये और गीता के इस सिद्धांत की मूल आत्मा लोगों की समझ से दूर होती चली गई। जिसका प्रतिफल हम आज कलयुग ही नहीं घोर कलयुग के रुप में देख रहे हैं।

आज के दिन हमें इस पर विचार करते हुए आत्म निरीक्षण करने की आवश्यकता है कि हम श्रीकृष्ण द्वारा दिखाए गए मार्ग से कितनी दूर हटकर चल रहे हैं। धर्म का पाठ पढ़ाने वाले क्या खुद धर्म की राह पर चल रहे हैं? क्या गीता का धर्म प्राणि मात्र से प्रेम करना नहीं सिखाता? क्या हम सभी आत्माएं एक ही परम-पिता परमेश्वर की संतान नहीं हैं? तो फिर आपस में बैर कैसा?

तो आइए आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि हम किसी से नफ़रत नहीं कर आत्म-भाई का भाव रखें। एक दूसरे की भावनाओं को समझें और एक दूसरे के प्रति प्रेम, शांति, सहानुभूति और समता की भावनाओं के साथ पेश आएं |

:--- मोहन "मधुर"

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