शिकागो में स्वामी विवेकानन्द (भाग-2)

Updated: Jan 29


हमने इस ब्लॉग के पहले भाग में जाना की स्वामी विवेकानंद जब शिकागो के धर्म संसद में बोलने के लिए खड़े हुए तो उनके खड़े होते ही वहाँ उपस्थित पाश्चात्य संस्कृति के विद्वानो के बीच किसप्रकार का माहौल पैदा हो गया। लेकिन, स्वामी जी के मन और मस्तिष्क पर इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होने अपने उद्बोधन की पहली पंक्ति “अमेरिकी बहनों और भाइयों” कहते ही उपस्थित श्रोताओं का दिल जीत लिया । सात हजार की संख्या में लोग खड़े होकर अपने तालियों से वातावरण में भूचाल पैदा कर दिया। दो मिनट तक तालियाँ बजती रही । वहाँ का माहौल बिलकुल बदल गया। उनके भाषण की दूसरी पंक्ति थी “आपने जिस प्यार और अपनेपन से हमारा स्वागत किया उसके लिए हम आप सबों के आभारी हैं”। जबकि उन्हें कोई प्यार और अपनापन नहीं मिला था। वे 30 जुलाई 1893 को अमेरिका पहुँच गये थे जहां जगह जगह उन्हें काले और गोरे के भेद पूर्ण दृष्टि का सामना करना पड़ा था। यहाँ तक कि उन्हें शिकागो के महंगे होटल का भुगतान न कर पाने की असमर्थता ने एक खड़ी माल गाड़ी के डब्बे में ठहरने को मजबूर कर दिया था। फिर भी उनकी महानता ने अमेरिकनों के लिए आभार प्रकट किया। स्वामी जी अपने भाषण की शुरुआत मेँ थोड़ा घबराये नजर आ रहे थे। लेकिन पहले पाँच शब्दों के कमाल ने उनका आत्मबल बढ़ा दिया था।

अब,जब उन्होने धारा प्रवाह बोलते हुए अपने संछिप्त भाषण मेँ “शिव महिमा स्त्रोतम”से दो दृष्टांत के अंशों को उद्धृत करते हुए कहा— उसका अभिप्राय था--जिस प्रकार विभिन्न जल धाराओं के श्रोत अलग अलग स्थानों मेँ होते हुए सीधे और टेंढे मेंढ़े रास्ते से गुजर कर अन्त मेँ जाकर समुद्र मेँ मिलते हैं, ठीक उसी प्रकार अलग अलग रास्ते जो, मनुष्य अपने विभिन्न प्रवृत्तियों के माध्यम से लेते(चुनते) हैं, वो भले ही विभिन्न लगते हों लेकिन अन्त मेँ वे सभी एक ब्रम्ह (परमात्मा / शिव ) मेँ ही मिलते हैं। और शिव के बारे मेँ उन्होने कहा जो कोई उनके पास किसी भी रूप मेँ आता है वे (शिव) उस तक पहुँचते हैं। सभी लोग उन मार्गों से संघर्ष कर रहे हैं जो अन्त मेँ उन (शिव) तक ले जाते हैं।

संसद के अध्यक्ष जॉन हेनरी बेरी ने कहा था-- भारत धर्मों की जननी का प्रतिनिधित्व स्वामी विवेकानन्द ने किया जो गेरुआ वस्त्र-धारी भिक्षु थे । जिंहोने जजेज पर सबसे अद्भुत प्रभाव डाला। इस भाषण के अगले दिन अमेरिका के सारे समाचार पत्र स्वामी विवेकानन्द के गुणगान से भरे पड़े थे। न्यूयॉर्क हेराल्ड ने कहा विवेकानन्द निःसन्देह धर्म संसद मेँ सबसे महान ब्यक्ति हैं। अमेरिकन समाचार पत्रों ने स्वामी विवेकानन्द को धर्मों की संसद मेँ सबसे महान ब्यक्ति और संसद मेँ सबसे लोकप्रिय और सबसे प्रभावशाली ब्यक्ति के रूप मेँ रिपोर्ट किया। तो ऐसे थे स्वामी विवेकानन्द।

इस प्रकार, स्वामी विवेकानन्द ने अपनी सहिष्णुता और विवेकशीलता से अपने जीवन के प्रारम्भिक काल मेँ ही भारत से बाहर जाकर दुनिया को भारतीय संस्कृति के विराट दर्शन कराये। हमें उनकी विचारधारा और उनके आदर्शों का अनुकरण करना चाहिए। हमारे देश मेँ आज शिकागो धर्म संसद मेँ उनके द्वारा बताए गये मूल्यों को अपनाकर चलने की आवश्यकता है।


:--- मोहन”मधुर”

41 views6 comments

Recent Posts

See All