वर्क फ्रोम होम


जब कभी महामारियाँ आती हैं, हमारी सोच, हमारे रहनसहन के तरीके, हमारे खान पान और न जाने हमारी संस्कृति में कितने प्रकार के बदलाव लाकर रख देती है। हमने 2019 ईस्वी के जाते जाते एक नई पीड़ा को जन्म लेते देखा है,वह है संक्रामक बिमारी कोरोना, यानि कोविड-19 । ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति चीन के हुवान शहर से हुई है। शुरू में इसे चमगादर से उत्पन्न बीमारी बताया गया। लेकिन विभिन्न वैज्ञानिक जाँचों के बाद जो तथ्य सामने रखे गए उससे यह समझ बनी कि यह चीन के हुवान लैब से शोध(रिसर्च) के दौड़ान लीकेज के कारण हुवान शहर में और फिर दुनिया के कोने कोने में फैलता चला गया। जो आज भी विभिन्न अवतारों (वैरिएंट) में सारी दुनिया को डरा रहा है।

इस महामारी ने हमें कुछ अँग्रेजी शब्दों के नए नए प्रचलन हिन्दी शब्दों के मेल के साथ करना सिखला दिया। क्यों कि देश के सभी भाषाई क्षेत्रों मेँ समान रूप से यह उसी प्रकार ब्यावहार मे आने लगे जैसे अङ्ग्रेज़ी मेँ। जैसे लॉक-डाउन,क्वारेंटाइन,वर्क फ्रोम होम, इत्यादी। हम यहाँ वर्क फ्रोम होम की चर्चा करना चाहते हैं। वर्क फ्रोम होम यानि घर में रहकर काम करना। आज के कम्प्यूटर युग में इंटरनेट एक ऐसा हथियार आ गया है जो इस नई कार्य संस्कृति की संभावना को जन्म दे दिया है। वैसे तो यह कोरोना काल में कार्यालय के स्टाफ को कोरोना संक्रामण से बचाने के लिए शुरू किया गया बहुत ही अच्छा और सकारात्मक सोच का प्रतिफल है।यह नई कार्य संस्कृति, आई टी कंपनी के कर्मी या वैसे कार्य से संबन्धित कर्मी जिस कार्य को कम्प्यूटर अथवा फोन के द्वारा किया जा सकता है, के साथ ही लागू हो सकता है।

एक तरफ इस नई कार्य संस्कृति से प्रभावित कर्मी को ऑफिस जाने की भाग दौड़, सफर की थकान, समय के खर्च आदि से मुक्ति मिल जाती है। तो दूसरी तरफ घर के बंद कमरे में कार्य में लीन रहते रहते जीवन उबाऊ लगने लग जाता है। बहुत सारे कर्मी ऐसे भी होते हैं जिनकी ज़िंदगी घर के अन्य सदस्यों या साथी के साथ दमघोंटू कमरे में गुजरती है। क्योंकि बड़े शहरों में घर में सोना ही तो होता है। उन्हें ऑफिस में जाकर काम करना अधिक अच्छा लगता है। समय से ऑफिस के लिए तैयार होना भी ज़िंदगी में गति प्रदान करता है। लाइफ एक रूटीन में बंधा रहता है । जबकि वर्क फ्रोम होम में इसके विपरीत रूटीन में शिथिलता और आलस्य हावी हो जाता है। इस प्रकार,एक प्रकारसे वर्क फ्रोम होम का जीवन नीरस लगने लगता है। ऐसे में कुछ लोगों में अवसाद (डिप्रेसन) तक होते सुना गया है। वर्क फ्रोम होम में घर से निकलने का मौका ही नहीं मिलता। वहीं घर में यदि दो तीन ब्यक्ति काम करने वाले हैं और दो तीन कमरे हैं तो सभी कमरे जूम कॉल में ब्यस्त । अन्य सदस्यों, बच्चों, बूढ़ों के लिए जगह का अभाव। इस तरह की अनेक समस्याओं से गुजरना पड़ता है। वहीं ऑफिस जाकर काम करने में अपने साथियों से सीनियर से मिल कर कुछ नया नया सा महसूस होता है और ताजगी आ जाती है। कुछ सीखने, डिस्कस करने के मौके भी मिलते हैं। वैसे, कंपनी वाले वर्क फ्रोम होम में इतनी कड़ी मोनिटरिंग करते हैं कि काम में कोई कमी नहीं रह पाती। बल्कि काम अधिक ही दबाब में करना पड़ता है।

कंपनी को वर्क फ्रोम होम में फायदे ही फायदे हैं। कंपनी के कर्मियों के लाने ले जाने के कैब का खर्च, ऑफिस मेटेनेंस का खर्च,बिजली बिल का खर्च चाय कॉफी के खर्च सब के सब बच जाते हैं। यहाँ तक सुना जा रहा है कि कुछ कंपनियाँ ऑफिस का किराया बचाने के लिए इसे पूरी तरह बंद कर देना चाहती हैं। और हमेशा के लिए वर्क फ्रोम होम लागू रखना चाहती हैं।


लेकिन, उपरोक्त तरह तरह की परेशानियों के आकलन से लगता है कि कर्मियों के बेहतरी के हिसाब से वर्क फ्रोम होम हमेशा के लिए होना उचित नहीं है। अभी इसप्रकार की कंपनियों में 5 दिनो का सप्ताह लागू है। कहीं समाचार पत्र में हाल ही में देखा था, कुछ देशों में 4 दिनों के कार्य दिवस पर प्रयोग चल रहा है। यानि सप्ताह में सिर्फ 4 दिन काम। आठ घंटे के बदले प्रतिदिन नौ घंटे काम करना होगा। चार कार्य दिवस की ब्यवस्था कर्मियों को अधिक पसंद आ रहा है साथ ही कंपनियों को भी। यह ब्यवस्था शायद भारत में भी जल्द ही लागू होने वाला है।

इसमें एक विचार और उभरकर सामने आ रहा है कि पुराने ऑफिस कल्चर में कर्मियों को अधिक परेशानी महसूस होती थी वहीं वर्क फ्रोम होम में थोड़ा बदलाव तो महसूस हो रहा है लेकिन अधिक दिनो तक यह ब्यवस्था भी उबाऊ लगने लगा है। इसलिए मिक्स कार्य प्रणाली थोड़ा अधिक राहत प्रदान कर सकता है जिसमें रोटेशन में महीने में एक सप्ताह लोग ऑफिस आकर काम करें। इससे थोड़ा बदलाव महसूस होगा और कर्मियों की सशरीर उपस्थिति मैनेजमेंट और कर्मी दोनों को एक नई ऊर्जा प्रदान करेगा। मेरे समझ से ऐसी मिक्स्ड ब्यवस्था ज्यादा कारगर साबित होगा।


:-- मोहन “मधुर”

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