मेरे एहसास



ज़िंदगी एक बहती धारा का नाम है । इस धारा मेँ जो बह जाते हैं, बहते चले जाते हैं । जो रुक कर ठहर जाते हैं उनकी एक पहचान बन जाती है । हर ज़िंदगी को बहाव नहीं मिलता और हर ज़िंदगी को ठहराव नहीं मिलता । ठहराव एक मंजिल की) उपलब्धि है। बहाव मेँ गति तो होती है पर मंजिल नहीं ।

परिचय उस व्यक्ति का होता है जिसके नाम उपलब्धियों की शृंखला होती है । बाकी सब मंजिल की चाह मेँ बहती हुई धारा के समान हैं। वैसे,जीवन जीने के लिए किया गया कार्य किसी उपलब्धि का नाम नहीं है । ऐसे लोग एक आम इंसान की भांति ही हैं जो गाने की इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है --"

खुदगर्ज़ दुनिया मेँ ये इंसान की पहचान है -

जो पराई आग मेँ जल जाए वो सच्चा इंसान है ।

अपने लिए जिये तो क्या जिये,

ऐ दिल तू जी जमाने के लिए।"

रुकने वालों मे महात्मा बुद्ध ,महावीर ,जैसे महात्मा हैं जिन्हें ठहराव मिला था । रामकृष्ण परमहंस ,स्वामी विवेकानंद ,गांधी और सुभाष जैसी हस्तियाँ भी इस श्रेणी मेँ आते हैं। बाकी हम सभी बहाव मेँ शामिल हैं। जब ठहराव मिलता है दुनिया उन्हें खुद जान जाती है।

फिर भी, खुद के बारे मेँ बता दूँ ---

मैं एक साहित्य प्रेमी हूँ । थोड़ा बहुत रंग और कुचियों के सहारे पेंटिंग कर लेता था, जिसे पुनः जीवित करने का विचार लिए ब्लॉग से जुड़ कर आपलोगों के करीब आने की इच्छा रखता हूँ। कविता कहानी के माध्यम से अपनी खुशियाँ समाज के दर्द और दुनिया की चुभन बाँट कर एक स्वस्थ सामाजिक सोच की स्थापना के प्रयास हेतु लगनशील होना मेरा ब्लॉग से जुडने का उद्देश्य है। ..

...मोहन मधुर

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