# मेडिटेशन कैसे करें # (भाग-2)




इस शीर्षक के भाग -1 में हमने ध्यान करने की प्राथमिक अवस्था के बारे में विचार किया था। बैठकर ध्यान करने में कुछ विशेष स्थिति पर हम यहाँ विचार करें। जब हम बैठकर ध्यान करते हैं तो जिस आसन में बैठते हैं उसके एक एक तरीके पर गौड़ करें ऐसा नहीं कि किसी प्रकार बैठकर ध्यान करने लग जाएँ। लापरवाही से ध्यान में बैठने से कोई लाभ नहीं मिलेगा। ध्यान में सफलता अवश्य मिलेगी बशर्ते इसे विधि पूर्वक किया जाये।

प्रारम्भ में गाइडेड मेडिटेशन करें और धीरे धीरे स्वतः करने लग जाएँ तो अच्छा रहेगा। अगर आप ध्यान करने लग जाएंगे तो आँखें बंद करने के बाद दोनों भृकुटियों के बीच स्वतः एक चमक के समान (ग्रे कलर में) दिखने लगेगा। लेकिन इसके बाद भी बहुत कुछ है इतना ही दिखना काफी नहीं है। आपकी सांसें धीमी होने लग जाएंगी,आपका शरीर हल्का लगने लगेगा, कभी कभी सुरंगों में प्रवेश करते अपने को पाएंगे कभी अपने आपको खुले आकाश में विचरण करते हुए, कभी पानी पर बैठ कर नाव या पक्षी की तरह बहते हुए,कभी महसूस होगा कि आप कुम्हार के चाक पर बैठे हों और चाक नाच रहा हो, कभी कभी लगेगा बहुत ही सुंदर कलाकारी/चित्रकारी दिख रही है, कभी आपका शरीर ऊपर की ओर उठता हुआ प्रतीत होगा, कभी आप अपने औरे में घूमते हुए महसूस करेंगे। ऐसा कुछ सेकेंडों के लिए महसूस होगा फिर ओझल हो जाएगा।इसप्रकार की स्थितियों को महसूस करना इसपर निर्भर करेगा कि आप ध्यान में अपने आपको कितना स्थिर कर पाते हैं और कितनी देर टिक पाते हैं। हर ब्यक्ति में स्थिर होने की क्षमता उसके अपने मन,बुद्धि,संस्कार से सम्बद्ध होती है। इस स्थिति को पाने में किसी को वर्षों लग सकते हैं, किसी को कुछ महीने और कोई कोई तो करते रह जाता है और नहीं हो पाता। परंतु ऐसा सोचकर हम प्रयास ही न करें यह उचित नहीं।



हाँ एक बात और बताना चाहता हूँ जो मेरी समझ में महत्वपूर्ण है। वह है आध्यात्मिकता में विश्वास। हर ब्यक्ति कम से कम वह जो शिक्षित है, इतना तो जरूर समझता है कि कोई न कोई ऐसी शक्ति जरूर है जो इस पृथ्वी/दुनिया या ब्रह्मांड को चलाता है और वह अदृश्य शक्ति का किसी धर्म विशेष से कोई संबंध नहीं है। यानि सबका मालिक एक है! हम अपने धर्म अथवा मजहब के अनुसार भले ही उसे राम कहें,अल्लाह कहें या ईश्वर। सब एक उसी परम आत्मा के बदले रूप में हैं। हमें उस परमात्मा में तो विश्वास करना ही होगा जो हम आत्माओं के पल पल की खबर रखता है। इस विश्वास या आस्था को ही हम आध्यात्मिक शक्ति या आध्यात्मिकता या spirituality का बोध कहते है।

हमारे मन में आध्यात्मिकता का बोध होना भी जरूरी है जिसके बिना हम ध्यान में सफल नहीं हो सकते है। आध्यत्मिकता का संबंध किसी धर्म विशेष से नहीं है बल्कि आंतरिक शक्तियों, आंतरिक मूल्यों,स्वमान(सेल्फ रेस्पेक्ट), आत्मविश्वास,दृढ़ता को मेडिटेशन द्वारा विकसित करने तथा आध्यात्मिक विवेक का प्रयोग वास्तविक जीवन में करने से है।


:--मोहन”मधुर”

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