भारत में अंग्रेजों का आगमन


भारत में पुर्तगालियों के ब्यापार एवं उनकी बढ़ती समृद्धि ने डच समुदाय को पूरब के देशों की ओर आकर्षित किया था। अंग्रेज़ भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। 1578 ईस्वी की बात है। सर फ्रांसिस डेक नामक एक अंग्रेज़ नाविक ने लिस्बन जाने वाले एक पुर्तगाली जहाज को लूट लिया। इसी लूटे गए सामानों मे से उसे कुछ नक्शे मिले जिसके सहारे अंग्रेजों को पहली बार भारत के नए समुद्री रास्ते का पता चला। इंग्लैंड ने 1588 ईस्वी में स्पेन के आर्म्ड़ा नामक जहाज़ी बेड़े पर विजय प्राप्त की थी। इस विजय के पश्चात अंग्रेजों का राष्ट्रीय संकट समाप्त हो गया। इसके बाद वे वाणिज्यिक ब्यवसाय को बहुत ही प्रेरित हुए। 1600 ईस्वी में लंदन के कुछ ब्यापारियों ने मिल कर एक कंपनी की स्थापना की। जिसका नाम ईस्ट-इंडिया कंपनी रखा। उस समय इंग्लैंड में रानी एलिज़ाबेथ का शासन था। रानी एलिज़ाबेथ ने इस कंपनी को पूर्वी देशों के साथ ब्यापार करने की अनुमती भी दे दी। 1608 ईस्वी की बात है जब अंग्रेजों का पहला जहाज़ सूरत पहुंचा। इस जहाज का नाम था हेक्टर और इसका कप्तान था होंकिंस जिसने अपने साथ ब्रिटेन के राजा का पत्र लाया था। होंकिंस सहमते हुए मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में पहुंचा। इतिहासकार कहते हैं--उस समय जहांगीर के दरबार में बैठे किसी भी सभासद को इस बात का कोई एहसास तक नहीं था कि जो अदना-सा पश्चिमी देश का अर्ध सभ्य दिखने वाला दूत ब्यापार की अनुमती पाने के लिए सम्राट के पैरो पे गिर-गिरा रहा है उसी की अगली पीढ़ी मुगल साम्राज्य को नेस्त नाबूत कर भारत पर शासन करने लगेंगे। 6 फरवरी 1613 को बादशाह के आदेश के द्वारा अंग्रेजों को ब्यापार करने और सूरत में फैक्ट्री लगाने की अनुमती दे दी गई और मुगल दरबार में ब्रिटेन के राजदूत रखने की इजाजत भी मिली। लेकिन, बाद में पुर्तगालियों के कहने पर यह आदेश रद्द कर दिया गया।

1615ईस्वी में सर टॉमस रॉ नामक एक अंग्रेज़ इंग्लैड के राजा जेम्स प्रथम का राजदूत बनकर सम्राट जहांगीर के दरबार में हाजिर हुआ। वह होकिंस की अपेक्षा अधिक तेज तर्रार, धूर्त और बुद्धिमान था। उसने अपनी राजनीतिक काबलियत और बुद्धिमानी से भारत में कोठियाँ खोलने की अनुमति प्राप्त कर ली। सूरत तो अङ्ग्रेज़ी ब्यापार का केन्द्र बनही गया था। मछली पट्टनम में 1631 में कोठी खोली गई, 1633 में बालासोर और हरिहर पुर में कोठियाँ खोली गई। 1640 ईस्वी में अंग्रेजों ने चंद्रगिरी के राजा से मद्रास खरीदा। मद्रास में सेंट जॉर्ज नामक किला बनवाया गया । 1651 ईस्वी में हुगली में एक फैक्ट्री स्थापित किया जहां आज कोलकाता शहर बसा है। जहांगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब के फरमान द्वारा अंग्रेज़ ब्यापरियों को अधिक से अधिक रियाएतें दी गई। बंगाल और दक्षिण में अंग्रेजों के कोठियों की संख्या बढ़ती चली गई। इसके बाद अंग्रेजों ने अपने ब्यापार सुविधा का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया।

इसकी शिकायत जब औरंगजेब के पास पहुंची तो औरंगजेब ने कोठियाँ जब्त करने और उन्हें देश से बाहर निकालने का फरमान जारी किया। परंतु अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी का परिचय देते हुए औरंगजेब से माफी मांग कर अपनी शर्मिंदगी जताई। फलतः उन्हे ब्यापारिक सुविधाएं फिर से लौटा दी गईं। 1698 ईस्वी में एक प्रतिद्वंदी कंपनी की स्थापना के बाद दोनों कंपनियाँ अपने अपने एकाधिकार की स्थापना के लिए आपस में लड़ने लगी। लगभग एक दशक तक लड़ाई चलने के बाद दोनों कंपनियों में आपसी सम्झौता हुआ। इसके बाद दोनों कंपनियाँ मिलकर 1708 ईस्वी में एक हों गई। समझौते के फलस्वरूप जिस नए कंपनी का उदय हुआ उसका नाम “यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी” पड़ा। यहाँ से भारत की गुलामी के सफर की शुरुआत हुई।

समय कितना परिवर्तनशील है समय का चक्र घूमता रहता है और वह अपने जाल में परिस्थितियों को फंसाते रहता है। दो सौ वर्षों की गुलामी के बाद 1947 में हमे अंगर्जों की दासता से मुक्ति मिली और पिछले दो दशकों से यानि आज़ादी के लगभग 5 दशक बाद ही समय की मांग पर हम फिर से विदेशी कंपनियों को खुद से आमंत्रित कर अपने देश में विदेशी कंपनियों के जाल बिछा लिए हैं। ब्यापार ही एक ऐसा रास्ता है जिसमें हम जरा सा चूके तो आर्थिक गुलामी और उसके बाद बंधुआ मजदूरी और क्रमशः स्वतन्त्रता पर खतरा। अतः हमें एक एक कदम संभाल कर रखने होंगे । जनता को सजग और सरकारों को अपने नियमों कानूनों को सख्त रखकर फैसले लेने होंगे। गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट, ट्वीटर,फेसबूक इत्यादी कंपनियों द्वारा हमारे निजी डाटा की चोरी की शिकायतें सुनने को आ रही हैं। साइबर क्राइम जैसी बातें हमें अभी से उलझाना शुरू कर दिया है। हमें अपने भविष्य को सुरक्शित रखने के लिए पूरी तरह सजग और सतर्क रहने की आवश्यकता है।

:-- मोहन”मधुर”

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