बागवानी एवं फूलों से लगाव

Updated: Feb 1


बचपन से मेरा लगाव फूलों से रहा है। जब मैं चौथी पाँचवीं कक्षा का छात्र था तब गाँव में घर के दरवाजे पर (यानि घर से बाहर) फूलों की क्यारियाँ बनाकर रंग बिरंगे और तरह तरह के फूल लगाया करता था । गाँव मुहल्ले के लोग फूलों के छोटे पौधे मांग कर मेरे घर से ले जाते थे । अपने अन्य भाई बहनों के साथ (जो हमारे चाचा के लड़के थे) पौधे लगाने एवं उसकी देखभाल का कंपिटीशन होता था । विद्यालय से आते ही किताबों के बस्ते को एक तरफ पटक देता था और क्यारियों के पौधों को निहारने लग जाता था। उसके कारण नास्ता पानी नहीं कर पाने की शिकायत पिता जी तक पहुँचती थी और उनकी डांट के बाद ही क्यारियों से हटता था। आज भी उन फूलों के नाम याद हैं जैसे गेंदा, गुलाब, तिउरा (बालसम),दोपहरिया ,सजीवनबूटी(पोर्टूलाका), क्रोटोन इत्यादि नामों से उस समय हमलोग जानते थे । ब्रैकेट में दिये गए नाम तो बाद में जानकारी हुई। ब्रैकेट के बाहर दिये गए नाम से ही बचपन में जानते थे। जब मैं इंटर में पढ़ने शहर आया तो घर से शहर आने के क्रम में बस की खिड़कियों से जब बड़े बड़े प्लाटों में फूलों की क्यारियाँ देखता तो सोचता मैं भी बड़ा होकर ऐसा ही प्लॉट लेकर फूलों की क्यारियाँ लगाऊँगा । लेकिन वे सपने सपने ही रह गए । फिर भी मन के कोने में इस लालसा की जगह कहीं न कहीं बनी रही । बैंक की सेवा में आने से शहर में मकान होने का सपना तो पूरा हुआ थोड़ा बहुत इस मकान के बाहर छोड़े गए जगह में शुरू से ही पौधे लगाने का शौक पूरा करता रहा। परंतु बैंकिंग सेवा के कड़े ड्यूटी निभाने में समयाभाव के कारण एवं बार बार स्थानांतरण मेरे शौक पूरे होने में बाधक बने रहे। सेवा निवृत्ति के बाद सही मायने में पूरे ध्यान एवं लगाव से कोशिश करने का मौका मिला। पौधे छत पर गमलों में लगाए और उन खिले फूलों का भरपूर आनंद लिया। परंतु पिछले वर्ष विभिन्न कारणों से बहुत दिनों तक घर से बाहर रह जाने के कारण पिछले पाँच वर्षों के पाले गए विभिन्न पौधे जीवित नहीं रह सके। क्योंकि समय पर उनकी देखभाल नहीं हो सकी। परंतु, मेरे अंदर का शौक मुझे बार बार इसे पुनः आबाद करने की प्रेरणा देते आ रहा है । परिवार में लोग इसे पैसे और समय की बरबादी की संज्ञा देते हैं, लेकिन लगता है मुझे इस कार्य में जितनी खुशी मिलती है उसके आगे पैसे का कोई मूल्य नहीं। कहीं से भी पैसे देकर इस प्रकार की खुशियां नहीं खरीदी जा सकती। पौधे लगाने के बाद उनके विकास से लेकर फूलों के खिलने तक एक एक दिन उसे देख कर मन में संतुष्टि एवं शांति का जो अनुभव मिलता है वह और कहाँ मिल सकता है?

अतः मेरी सलाह है –आप भी अपने वैसे शौक जिससे आपके स्वस्थ्य को नुकसान न पहुंचता हो जीवित रखें और उसी में खो जाएँ। यह भी एक प्रकार का मेडिटेशन है। जिएँ तो खुल के जियें, इन फूलों की तरह मुस्कुरा के जियें गैरों को अपना बना के जियें। और मैं भी अपनी इस छोटी सी उजड़ी बगिया को पुनः आबाद करने मे लगा हूँ। ऊपर दिया गया फोटो मेरी बागवानी का है।


:--- मोहन “मधुर”

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