# बदलती ज़िंदगी



आजकल के जमाने मेँ सामाजिक बदलाव बड़ी तेजी से हो रहा है। समाज मेँ पाश्चात्य संस्कृति हावी होती जा रही है। इस बदलती ज़िंदगी को देखकर मन मेँ उठे भावों का प्रस्तुतिकरण इस कविता के माध्यम से किया जा रहा है। कविता का शीर्षक है --

बदलती ज़िंदगी


ज़िंदगी को देखा है, मैंने करीब से

पल में बदल गए

जो रिश्ते अजीज थे,

राहों में दर्द दे गए

जिनसे रौशनी की चाह थी

रस्ते बादल गये हैं

जमाने के अजीब से

ज़िंदगी के मोड़ को

यूँ अनदेखा न कीजिये

कौन सा गुल खिलेगा ?

ये सोचा न कीजिये

अरमानों के गुल मुरझा गये

जो थे उम्मीद के

ज़िंदगी को देखा है

मैंने करीब से

ज़िंदगी .............।



:--- मोहन “मधुर’


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