#प्रकृति को हम कुछ दें #



हमें अपने मन में हमेंशा प्रकृति को कुछ देने की भावना रखनी चाहिए जिसमें उसके बदले में कुछ पाने की इच्छा निहित नहीं हो। हमें प्रकृति ने बहुत कुछ दिया है। मिट्टी,जिसमें हम खेल कर बड़े हुए। हवाएँ, जिसके बल पर हमारी सांसें चलती हैं। पानी, जिसके बिना हमारा हर कार्य ही नहीं जीवन भी चलना मुश्किल है। हम जिस घर में आलीशान बंगले व अट्टालिकाओं में रहते हैं उसके बनाने में लगी एक एक वस्तु हमने इस पृथ्वी या प्रकृति से ही तो लिया है! इस बात को हम कैसे भूल सकते हैं कि हम भी तो प्रकृति का ही अंश हैं। प्रकृति ने दुनिया में इंसान पैदा किया उसे मस्तिष्क जैसे अनमोल वस्तु देकर कितना बड़ा उपकार किया है कि उसने अपने नंगा पैदा होने के बावजूद अपने उपयोग एवं उपभोग के लिए छोटी सी सुई से लेकर हवाई जहाज, बुलेट ट्रेन ही नहीं आज बिजली,मोबाईल, टी वी, कम्प्यूटर और न जाने कितनी अनगिनत चीजें बना ली हैं। जिसने उसकी ज़िंदगी आसान कर दिया है। ये सारी चीजें तो किसी न किसी इंसान की ही देन है। हम सोचें कि इन सारी चीजों के आविष्कार करने वालों ने पूरी मानवता पर कितना बड़ा उपकार किया है? वही मस्तिष्क जो प्रकृति ने उनलोगों को दिया हमें भी दिया। उन्होने इस मस्तिष्क का उपयोग कर अपनी मानसिक शक्ति को बढ़ाया और उसकी उपज दुनिया को दिया। जिसके बल पर दुनिया इतनी निराली लगती है कि जो यहाँ आता है,फिर जाना नहीं चाहता।

अब, यह सवाल आपके मन में उठना स्वाभाविक है कि मेरे पास क्या है कि हम प्रकृति या दुनिया को दे सकते हैं? परंतु, ऐसा नहीं है। एक भिखमंगे के पास भी प्रकृति को देने के लिए कुछ है। एक भिखमंगा भी दुनिया या प्रकृति को दे सकता है। हम सभी प्रकृति को समान रूप से बिना हैसियत की बराबरी किए यदि कुछ दे सकते हैं तो वह है “अच्छी और सकारात्मक सोच”। जी हाँ! आपने बिल्कुल सही पढ़ा अच्छी और सकारात्मक सोच ही वह वस्तु है जो राजा से रंक तक बराबर का योगदान कर दुनिया को बदल सकते हैं।

आज परिस्थिति ऐसी है कि छोटी छोटी बातों को हम आपसी तनाव में बदल देते हैं । यह हम स्वयं नहीं करते इसे करनेवाला कोई और है जिसके स्पंदन (वाइब्रेशन)का असर हम पे पड़ता है। हर नकारात्मक विचार या सोच पहली बार कभी किसी एक के मन में उठा होगा जिसका स्पंदन बढ़ते बढ़ते आज इस स्थिति में पहुँच गया है कि दुनिया नकरतमकता से भर गई है। कहते हैं कि भारत की जनसंख्या शुरू शुरू में 33 करोड़ थी और हम यह भी सुनते आ रहे हैं कि हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं साथ ही यह भी कहा जाता है कि हमारे देश में एक समय राम राज्य था। इसका मतलब साफ है कि हमारे देश में जब राम राज्य था या उससे पहले कोई समय ऐसा था जब 33 करोड़ की आबादी देवी देवताओं की तरह ब्यावहार करते थे उनमें न ईर्ष्या थी, न बैमनष्य था,न घृणा थी इतना ही नहीं किसी प्रकार के नकारात्मक भाव नहीं थे। इसलिए वे देवता के समान पूजनीए थे। धीरे धीरे नकारात्मक विचार किसी एक के मन में आया और वहाँ से बढ़ते बढ़ते कलयुग आ गया। जिसे हम कलुषित युग भी कह सकते हैं।


हम पीछे की बात तो अभी रहने दें, मात्र 40-50 वर्ष पहले हम अपने बचपन से या जब हमें होश हुआ तब से जो भी देखते आ रहे हैं उस पर गौड़ फरमायेँ । हम पाएंगे कि समाज में लोगों के बात ब्यावहार, आचरण, सोच-समझ, आपसी प्रेम, पारिवारिक बनावट (फेमिली स्ट्रक्चर) और अनेक प्रकार की समझ में कितना बदलाव आया है। पहले परिवार संगठित हुआ करता था जिसे हम संयुक्त परिवार कहते हैं। आज इसका लगभग नामों निशान मिट गया है। ऐसा किसी एक परिवार में कभी पहली बार हुआ होगा जब भाई भाई एक दूसरे से अलग हुए होंगे या उनके बीच वैमनष्य पैदा हुआ होगा । उसका असर उस गाँव में हुआ दूसरे अनेक परिवारों में विभाजन हुआ होगा और धीरे धीरे बढ़ कर पूरे समाज और देश में फैला होगा। इसीप्रकार किसी भी घटना या अपराध पर हम नज़र डालें तो हम पाते हैं कि हमारी ही ज़िंदगी में पहले जो कभी नहीं या इक्का दुक्का घटनाएँ होती थी (चोरी, डकैती,घूसख़ोरी,घोटाला या कोई भी आपराधिक वारदात की घटनाएँ जिसके हमेँ यहाँ नाम लेना भी उचित नहीं लगता) अब दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं। यह किस कारण से बढ़ता है? इसका जवाब है इन नकारात्मक समाचारों के समाचार पत्रों, टीभी, सोशल मीडिया या एक कान से दूसरे कान द्वारा फैलने से और हमारे मस्तिष्क में इन विचारों के स्पंदन द्वारा प्रवाह से। इतना ही नहीं देश और दुनिया की जन संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है जिससे नकारात्मक सोच के इनपुट पाने वाले यूनिट भी तो बढते जा रहे हैं। ये (यूनिट) इकाई जितने बढ़ेंगे उस सोच की गुणात्मकता (उतना गुणा वृद्धि की क्षमता) उतनी ही बढ़ती जायेगी। अंततः नकारात्मक सोच की पैदावार उतनी ही अधिक बढ़ती जायेगी।

अतः हम सभी अपनी सकारात्मक सोच द्वारा ही इसमें अपना योगदान कर दुनिया के नकारात्मक प्रवाह को रोक सकते हैं। इसके लिए हमें खुद को बहुत बड़े पैमाने पर बदलना होगा अपने सोच में परिवर्तन लाकर,अपने ब्यावहार में परिवर्तन लाकर,अपनी कल्पनाओं में परिवर्तन लाकर। हमें अपने गुस्से पर काबू रख कर एक दूसरे से ब्यावहार और वार्तालाप करना होगा। चाहे सामनेवाला कितना भी गुस्सा करे हमें शांति से काम लेना होगा। हर कदम सोच सोच कर बढ़ाना होगा जिससे हर आचरण में हमारे अंदर से दैविए गुणो के परावर्तन की झलक दिखाई दे। ऐसा ब्यवहार हम यदि करने लग जाएंगे तो हमें देखकर अन्य लोग भी ऐसा आचरण करना सीख लेंगे और फिर वातावरन में इसका स्पंदन चर्चाओं द्वारा फैलेगा। एक से दो, दो से चार, चार से आठ लोगों में स्पंदन फैलते हुए यह हमारे समाज के परिवर्तन का कारण बन जाएगा।

तो हम सभी क्यों न अपने आप को बदलने के लिए कुछ संकल्पों को शुबह शाम और जब कभी फुर्सत में हों तो दुहराएँ । कहते हैं संकल्प से सिद्धि होती है ! इन संकलपों को दुहराने से हमारे अवचेतन मन पर प्रभाव पड़ेगा और हमारे अंदर अपने में बदलाव की इच्छा जगेगी और हम बदलाव की दिशा में अग्रसर होंगे।

ये संकल्प हैं----

1 मैं शांति स्वरूप आत्मा हूँ ! 2. मैं सतयुगी आत्मा हूँ ! 3. मैं परमात्मा का फरिश्ता (representative) हूँ ! 4. मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिए !(यह चौथा संकल्प इसलिए है कि हमें दूसरों से बिना अच्छे ब्यवहार की आशा किए ही अपना ब्यवहार अच्छा करते रहना है)

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि हम सभी इन पूरी बातों को अच्छे से समझ गए हैं और इसका अनुशरण करने में हमें कोई हिचक नहीं होगी। ऐसा कर हम प्रकृति और दुनिया को बदलने में बहुत बड़ा योगदान देंगे। इसलिए मैंने कहा हर कोई यानि एक भिखमंगा भी प्रकृति को बहुत कुछ दे सकता है। तो........आइए हम आज से ही सकारात्मक सोच के लिए अपने को तैयार करने मेँ लग जाएँ और आम नागरिक को भी इसका बोध कराने का प्रयास करें।


:--- मोहन”मधुर”

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