पहेली चितवन की



पहेली चितवन की


दो बूंदें

क्या पानी की ?

नहीं, पारे की ।

कहाँ, पत्ती पर ?

नहीं, हथेली पर।

कैसी, हथेली ?

दिखलाओगे ?

तुम्हें साहस नहीं ।

कैसा साहस ?

संभलने का ।

संभलना किस से ?

बेचैनी से।

कैसी बेचैनी ?

उन बूंदों की ।

क्या बकते हो ?

एक पहेली ।

क्या पागल हो ?

नहीं दिवाना हूँ ।

किसका ?

उन बूंदों का ।

कैसी बूंदें ?

नहीं समझोगे ।

क्या ?

चंचलता ।

किसकी चंचलता ?

जिसका दीवाना हूँ ।

क्यों नहीं समझूँगा ?

क्योंकि कोई नहीं समझा—

पहेली चितवन की ।


:--- मोहन “मधुर”

(मेरी यह कविता उन दिनों की है जब मैं रांची कृषि महाविद्यालय का छात्र था।)

(आकाशवाणी रांची से युवा-वाणी कार्यक्रम में प्रसारित)

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