परिवर्तन के लिए लक्ष्य की स्पष्टता


प्रायः ऐसा देखा जाता है कि हम अपने को बिना स्पष्ट लक्ष्य के ही किसी कार्य में झोंक देते हैं। जिससे हमारी सफलता की कोई दिशा निर्धारित नहीं हो पाती और हमारा परिश्रम निरुद्देश्य रह जाता है। अपने आप में मूल भूत परिवर्तन हम तभी ला सकते हैं जब हमारा लक्ष्य स्पष्ट हो, इच्छाशक्ति दृढ़ और क्षमता भरपूर हो। जीवन में मूल्यों और अपने संकल्पों की शक्ति के आधार पर सक्रियता लाने के लिए हमारे लक्ष्य का स्पष्ट होना जरूरी है। किसी कार्य को प्रारम्भ करने के लिए ही नहीं उसे जारी रखने और आगे बढ़ाने के लिए भी प्रेरणा,उत्साह एवं निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति के लिए क्षमता (capacity) एवं कार्य-कुशलता (skill) का होना आवश्यक है। यदि स्पष्ट लक्ष्य,दृढ़ इच्छाशक्ति एवं क्षमता इन तीनों में से एक का भी अभाव हो तो हमें सफलता नहीं मिल सकती। यदि हमारे पास स्पष्ट लक्ष्य एवं क्षमताएँ दोनों हों पर दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव हो तो हमें अपने में लाया गया परिवर्तन स्थायी नहीं हो सकता। इसका कारण है कि हमारे अंदर लाये गए परिवर्तन को जारी रखने की दृढ़ता का अभाव है। ठीक इसीप्रकार, हमारे पास स्पष्ट लक्ष्य और दृढ़ इच्छाशक्ति हो। परंतु,क्षमता का अभाव हो तो भी हम आवश्यक परिवर्तन कला और कुशलता के अभाव में नहीं ला सकते। पुनः,यदि हमारे पास दृढ़ इच्छाशक्ति और क्षमता दोनों हों पर हमारा लक्ष्य ही स्पष्ट ना हो तब भी हमें अपने मनोरथ की सिद्धि नहीं हो सकती। क्योंकि जब हमें पता ही नहीं होगा कि करना क्या है, पहुँचना कहाँ है,तो हम लक्ष्य विहीन होकर भटकते रह जाएँगे और हमारी ऊर्जा ब्यर्थ नष्ट हो जाएगी। संस्कृत का एक श्लोक है:--

“उद्यमेन हि सिद्धन्ति कार्याणि, न मनोरथई:। ना हि प्रविश्यसि, सुप्तष्य सिंहस्य मुखे मृगा:।”

(अर्थात उद्दयम से ही कार्यों में सिद्धि(सफलता) प्राप्त होती है,केवल मन में इच्छा रखने से नहीं। ठीक उसी तरह, जैसे सोये हुए शेर के मुख में मृग खुद से प्रवेश नहीं कर जाता।)

अतः किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए उपरोक्त तीनों कॉम्पोनेंट (भागों) का एक साथ होना आवश्यक है।


अब सवाल उठता है कि हम शुरुआत कहाँ से करें? निश्चित रूप से इसकी शुरुआत एक स्पष्ट लक्ष्य से कर सकते हैं। क्योंकि,यदि हमारा लक्ष्य स्पष्ट होगा यानि हमारे चलने की दिशा और पहुँचने का स्थान मालूम हो तो हमारी इच्छाशक्ति अवश्य ही दृढ़ हो जायेगी और जब इच्छा शक्ति दृढ़ हो जाएगी तो हम आवश्यक हुनर प्राप्त करने लग जाएंगे और अपनी क्षमता को निश्चित तौर पर विकसित कर लेंगे या तो खुद से या किसी का साथ या सहारा लेकर। इसप्रकार, हमारे पास स्पष्ट लक्ष्य प्राप्त होने के साथ दृढ़ इच्छाशक्ति, दृढ़ इच्छाशक्ति प्राप्त होने के बाद आवश्यक क्षमता का विकसित होना हमें कार्य की सफलता तक पहुंचाएगा। इसलिए हमारे मन में सबसे पहले स्पष्ट लक्ष्य का अंकुरित होना जरूरी है।

स्पष्ट लक्ष्य--à दृढ़ इच्छाशक्ति---à क्षमता का विकास---àसफलता (लक्ष्य की प्राप्ति)


;--- मोहन “मधुर

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