# परमात्मा का स्वरूप #


परमात्मा का वास्तविक स्वरूप कैसा है? यह हम नहीं जानते कि परमात्मा कैसे हैं लंबे हैं,छोटे हैं, दुबले हैं,मोटे हैं,काले हैं या गोरे हैं। जिस रूप में हम उनकी कल्पना करते हैं, वे उसी रूप में दिखाई देते हैं। कृष्ण के अवतार के रूप में करें तो कृष्ण । राम के अवतार के रूप में करें तो राम । यदि अल्लाह को मानते हैं तो अल्लाह हैं। यदि हम ईसा मसीह को मानते हैं तो वे इसा मसीह हैं।

हम यदि राम को पूजते हैं वे हमारी प्रार्थना स्वीकार कर हमें आशीर्वाद देते हैं। परंतु,जो राम को नहीं मानते उन्हें आशीर्वाद प्राप्त कैसे होता है? उनका समय कैसे गुजरता है? उनकी ज़िंदगी की समस्याएँ कौन सुलझाता है? अवश्य ही कोई और शक्ति उनकी समस्याएँ सुलझाता है, उन्हें अपना आशीर्वाद देता है। यदि हम विदेशियों की बातें करें तो उनको कौन आशीर्वाद देता है ? क्या उन्हें कोई आशीर्वाद प्राप्त नहीं होता? अवश्य प्राप्त होता है,लेकिन उनके द्वारा जिनके रूप को वे पूजते या मानते हैं। यानि दुनियाँ में सबों को आशीर्वाद देने वाली शक्तियाँ क्या अलग अलग हैं? जबाब है, नहीं ।

स्वामी राम कृष्ण परमहंस ने भगवद्गीता के एक श्लोक का विवरण देते हुए कहा है----“ईश्वर सभी धर्मों से परे हैं। किसी भी धर्मानुसार या किसी भी विधि से उनकी उपासना करो, तुम्हारी प्रार्थना उन तक अवश्य पहुंचेगी।“

ईश्वर का कोई विशेष आकार नहीं है। उन्हें किसी भी आकार या स्थिति में बाँधा नहीं जा सकता। हमें इस सत्य को हर हालत में स्वीकार कर लेना चाहिए कि जिस आकार में हम उनकी कल्पना कर पूजते हैं,उसी रूप में आकर वे हमें आशीर्वाद देते हैं।

ईश्वर का निवास कहाँ होता है? मंदिर में, गिरिजाघर में या मस्जिद में ? भगवद्गीता के एक अन्य श्लोक का वर्णन करते हुए स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहते हैं --- मंदिर में प्रदक्षिणा करते समय एक एक करके आठों दिशाओं की तरफ मुंह करके प्रार्थना करने की प्रथा है। पर इस प्रथा का उद्गम कैसे हुआ? यह प्रथा इस बात की याद दिलाने के लिए है कि धरती पर ईश्वर हर जगह और हर दिशा में मौजूद हैं ।

महान भक्त प्रह्लाद ने भी कहा था ईश्वर कण कण में बास करता है, हम में,तुम में, खड्ग खंभ में जहां देखो विराजमान है। इसलिए, पृथ्वी पर ऐसी कोई जगह नहीं जहां ईश्वर न हो। हमें इस तथ्य को नकारना नहीं चाहिए कि पृथ्वी पर वायु रहित स्थान हो सकता है पर ईश्वर रहित नहीं।

गीता में भगवान द्वारा कहा गया है--- जो भी ब्यक्ति पवित्र हृदय से फल,फूल,पत्ते,जल आदि सुलभ वस्तुओं से मेरी आराधना करेगा, मैं उसकी पूजा को मन से स्वीकार करूंगा। पूजा और प्रार्थना में हृदय की पवित्रता ही मुख्य है। कीमती वस्तुओं,स्वर्ण,रत्नों से ईश्वर कभी संतुष्ट नहीं होते। भगवान सच्चे मन के भूखे हैं वे मनो-भावों के भोग को ही स्वीकार करते हैं।

एक बार रुक्मणी और स्त्यभामा के बीच इस बात की चर्चा हुई कि उन दोनों में से कौन कृष्ण से अधिक स्नेह करती हैं? दोनों ने एक दूसरे से अपने आप को उत्तम समझा । अंत में दोनों ने एक जांच द्वारा इसका समाधान पाने की कोशिश की। एक तराजू के एक पलड़े में सत्यभामा ने सोना,चांदी,रत्न,और कीमती आभूषण रखे, जबकी रुक्मणी ने दूसरे पलड़े में प्रेम,सम्मान,स्नेह और विनम्रता से तुलसी का पत्ता रखा। दोनों पलड़ों में सोना,चांदी,रत्न और आभूषणों के पलड़े से तुलसी के पत्ते वाला पलड़ा भारी हुआ। श्री कृष्ण ने रत्नों और आभूषणों की अपेक्षा तुलसी के पत्ते को आनंद से स्वीकार किया। क्योंकि उसे विनम्रता,सरलता,स्नेह और पवित्रता से समर्पित किया गया था। इसीप्रकार, जब बचपन के मित्र सुदामा कृष्ण से मिलने गए तो उन्होने अपने साथ सौगात के रूप में एक फटे कपड़े में फरही बांध कर लाये थे। सुदामा कृष्ण के महल और राजसी ब्यावस्था देखकर फरही की पोटली शर्म से छुपाने लगे। लेकिन,श्री कृष्ण बालपन के प्रेम के वशीभूत होकर अपने को रोक नहीं सके और सुदामा से फरही छीन कर बालक की भांति खाने लगे।

ये दोनों प्रकरण भगवान के द्वारा स्नेहमय और पवित्र हृदय के प्रति उनके आकर्षण को दिखलाता है। इसलिए कहा गया है संवलिया भाव के भूखे।

कर्नाटक के उडुपी क्षेत्र में श्री कृष्ण का एक मंदिर है जिसके मुख्य द्वार की ओर पीठ किया हुआ भगवान की मूर्ति है। मंदिर में प्रवेश करते ही भगवान के पीठ के दर्शन होते हैं। कहा जाता है-- एक ऐसा भक्त जो हीन जाति के होने के कारण मंदिर में प्रवेश पाने से बंचित था। वह प्रतिदिन मंदिर के द्वार तक आता था और उसे प्रवेश नहीं मिल पाता था। इस कारण मायूस होकर लौट जाता था। आँखों में आँसू भरकर प्रतिदिन भगवान से उनके दर्शन के लिए प्रार्थना करता था। एक दिन भगवान ने उन्हें स्वप्न में कहा—मंदिर की पिछली दीवार में एक छेद है। उस छेद से तुम मुझे देखना तुम्हारे लिए मैं उस दिशा में मुड़ जाऊंगा। इसप्रकार तुम मेरे दर्शन कर सकोगे। अपने भक्त को दर्शन देने के लिए श्री कृष्ण पीछे मुड़ गए। इस मूर्ति को आज भी उडुपी के मंदिर में देखा जा सकता है।

इसप्रकार, हम पाते हैं कि ईश्वर या परमात्मा एक अदृश्य शक्ति का नाम है जो किसी धर्म से बंधा हुआ नहीं है। उसका न कोई आकार है न कोई रूप है। उमकी कृपा सब पर बराबर होती है। जो पवित्र और निश्छल भाव से पुकारता है उनके लिए वे सदैव उपस्थित रहते हैं,हर गली हर नुक्कर हर दिशा हर रूप और हर रंग में। पहचान हमें करना है! अपने मनो भावों से ......।


:--- मोहन “मधुर”

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