जीवन का आनंद


अक्सर हम अपने जीवन में जो कुछ करते हैं उसके पीछे हमारा कुछ उद्देश्य छिपा रहता है। हमारी कुछ कामनाएँ छिपी हुई होती हैं। इस उद्देश्य या कामनाओं की पूर्ति के लिए हम उसमें इतना मशगूल हो जाते हैं कि हमें अपने आप से बाहर निकलने दुनिया को देखने, समझने उसका आनंद लेने की ना तो फुर्सत होती है न उसकी सुध । जैसे किसी गाड़ी का चालक जब गाड़ी ड्राइव करता रहता है तो उसे केवल सड़क के बीच की गतिविधियों का ही ध्यान रहता है सड़क के अगल बगल की गति-विधियों से वह नावाकिफ रह जाता है। यदि वह किसी बाज़ार से गुजर रहा हो तो उसे पता नहीं रहता कि कौन सी दुकान कहाँ पर है, वह सिर्फ अपना ध्यान सड़क पर गाड़ी के संतुलन में ही लगाने में रह जाता है। इसी प्रकार, बड़े ब्यावसायी,बड़े कारोबारी, डॉक्टर,राजनेता,अभिनेता, बैंकपदाधिकारी,बड़े बड़े प्रोफेसनल अपनी दक्षता हासिल करने,अपने ब्यावसायिक लक्ष्य प्राप्त करने की धुन में इतने मशगूल हो जाते हैं कि दुनिया का आनंद उनसे बहुत पीछे छुट जाता है। अपनी भाग दौड़ की ज़िंदगी में अपने बच्चों अपने परिवार अपने रिश्तेदार अपने समाज से जुडने का समय ही नहीं रह पाता। ऐसा करने में भले ही उन्हें अपनी दक्षता अपना ब्यावसायिक लक्ष्य और अपनी कार्य कुशलता प्राप्त हो जाती है, लेकिन बहुत कुछ उनसे इतना पीछे चला जाता है कि जब उन्हें इस बात का एहसास होता है तो वह समय ऐसा नहीं रहता कि उस छूटे हुए वस्तु,परिस्थिति,भावनाओं आदि को वापस फिर से प्राप्त किया जा सके । उस समय ऐसा भी महसूस होता है कि जो हमने पाया उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण या मूल्यवान वह कार्य था जो छूट गया और उस समय हाथ मलने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता।

हमने ऐसे परिवार को देखा है जो पति पत्नी दोनों उच्च विद्यालय के प्रधानाध्यापक के पद से रिटायर हुए । पैसे तो उन्होने अर्जित किए घर, मकान रहन सहन सब ठीक था। लेकिन, वे शुरू से ही एक बहुत बड़ी गलती करते आ रहे थे। जब उनका बड़ा बेटा छोटा था,तो जब कभी श्रीमति जी अपने काम पर जाती तो बेटा उन्हें छोडना नहीं चाहता। बेटे को अपने से अलग घर में रहने के लिए कुछ पैसे दे दिया करती थी। इस बात की बेटे को लत्त लग गई और यह लत्त उसकी शादी के बाद भी जारी रही। जब कभी माँ बाहर जाती माँ का आंचल खींच खींच कर पैसे मांगना शुरू कर देता और उस पैसे से शराब पीने की आदत लग चुकी थी । माता-पिता को अपने कार्यों में ब्यस्त रहने के कारण इसकी भनक तक नहीं थी। माता-पिता को जब शराब की लत्त का पता चला तबतक बहुत देर हो चुकी थी।

इसतरह, जब हम अपनी योजना सभी दृष्टिकोण पर नजर डाले बिना बनाते हैं तो हमारी उपलब्धि अधूरी रह जाती है, उस शिक्षक दंपति की तरह जिन्होने पैसे तो कमाए लेकिन अपनी अगली पीढ़ी को शराब जैसे दीमक के हवाले उसे कुतरने को छोड़ दिया और उनकी सफलता अधूरी रह गई।

इसलिए,हमें अपने आपको भविष्य में किन किन उद्देश्यों को प्राप्त करना है,उसकी योजनाओं को जीवन के शुरुआत में ही सोच कर आगे बढ़ना चाहिए। जिससे हमें किसी प्रकार की कमी रह जाने का अंत में अफसोस न हो। हमें अपनी अधूरी सफलता के दंश को न झेलना पड़े। तभी जीवन का आनंद हम ले सकेंगे। इस बात का ज्ञान हमें अपनी अगली पीढ़ी को भी देना चाहिए ताकि उनकी सफलता अधूरी न रह जाये और उन्हें भी अंत में जीवन का आनंद महसूस हो सके।


:--- मोहन “मधुर”

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