जरा विचार करें !


आजकल मेरे घर के पास मुख्य सड़क के चौड़ीकरण का कार्य चल रहा है साथ-साथ सड़क के दोनों ओर नाला का निर्माण भी। इस क्रम में गड्ढे खोदे गए तो देखा प्लास्टिक के कचरों का ढेर लग गया। ये वो कचरे हैं जो हमने नालियों में बहाये या सड़कों पे उड़ेल दिये और नगर निगम अथवा निर्माण एजेंसी ने जिसे पहले भी और पुनः आज भी सड़कों के नीचे दबा दिये। ये कचरे हमेशा के लिए धरती माँ के सीने में दफन हो गए। याद रखें हम जो प्रकृति को देते हैं, बाद में हमें वही वापस मिलता है। इस तरह के कार्य के परिणाम वश हमारे पीने के पानी में प्लास्टिक की मात्रा बढ़ रही है जो हमारे भविष्य के जीवन पर प्रश्न चिन्ह बनने जा रहा है। यह कैंसर जैसी घातक बिमारियों का कारण बन सकता है। दूसरी बात, पूरे शहर में केवल इस रोड में ही लगभग दोनों तरफ विशाल-विशाल वृक्ष खड़े थे जिन्हें एक एक कर काटना पड़ा है। इसे देख कर उपजे दर्द को मैं इस आलेख द्वारा ब्यक्त करना चाहता हूँ.। विकास कितना महंगा सौदा है?


आज मेरी उम्र 65 वर्ष की है। हमारे वरीए साथियों,मित्र ,बंधुओं, जो सक्रिय जीवन जी रहे हैं उनकी अधीकतम उम्र 80 वर्ष होगी। हम सभी बचपन से देखते आ रहे हैं कि हमारी वन संपदा का कितना दोहन हुआ है । उस तुलना में इस मामले में प्रयास करके भी हम वांछित स्तर तक वनाच्छादन नहीं कर पाये हैं। इसके विपरीत कल कारखानों और वाहनों के बढ़ते सैलावों को हम अपने विकास के नाम पर इस स्थिति में लेकर खड़े हैं कि हमें इसके संचालन से ही आए दिन परेशानियों का सामना करना पड़ता है।सड़कों के जाम होने से लेकर वायु मण्डल में बढ़ते प्रदूषण के स्तर से हमें दो चार होना, रोज-रोज की समस्या हो गई है।

याद करें, जब हम छोटे थे तो गाँव में भोज खाने के लिए लोटा,गिलास (ग्लास) घर से लेकर जाते थे। केले अथवा पुरइन के पत्ते पर भोजन कर अपने वातावरण को स्वच्छ रखने में सफल थे। आज त्योहार और शादी, श्राध्य जैसे अवसर पर प्लास्टिक के बने ग्लास और प्लास्टिक एवं थर्मोकोल के बने प्लेटों का उपयोग कर हम विकास के गीत गा रहे हैं। आज हम वैज्ञानिकों को वाह वाही दे रहे है प्लास्टिक के आविष्कार के लिए । लेकिन यह प्लास्टिक हमें क्या दे रहा है? कभी आपने सोचा है? हम घर से निकलते समय कपड़े के थैले बाज़ार ले जाना अपनी हीनता समझते हैं और उधर से प्लास्टिक के थैलों में भर कर सब्जियाँ और अन्य वस्तुएँ लाकर इतराते नहीं थकते। परिणाम? प्लास्टिक कचरे के उत्पादन बढ्ने से शहरों की नालियों के जाम होने की भयंकर समस्या का खड़ा होना। गांवों से लेकर शहरों तक बढ़ते प्लास्टिक का उपयोग हमें कहाँ ले जाएगा मालूम नहीं।


दूसरी तरफ, विकास के नाम पर कंक्रीट के जंगलों की बाढ़ आ गई है। बहुमंज़िली इमारतें, सड़क से लेकर घर तक हमने धरती माँ के आँचल को कंक्रीट से सजा दिया है। जिससे धरती के जल ग्रहण क्षेत्र घटते जा रहे हैं। परिणाम, जल स्तर का गिरना और पीने एवं सिंचाई के लिए पानी का अभाव बढ़ते जाना। शहरों में मिट्टी द्वारा जल के अवशोषण की क्षमता घटने से हल्की वर्षा में भी जल जमाव ।

हम दशकों से गोबर की जगह रासायनिक खादों का इस्तेमाल कर खेतों और खुद की सेहत का नुकसान करते आ रहे हैं। जब हम पशुपालन करते थे, घर-घर में गो-पालन किए जाते थे। गोबर खेतों में डाले जाते थे और दूध-घी हमारे पेटों में। दोनों तरफ से हमारी सेहत पर अच्छे प्रभाव थे। अब, पशुपालन छोड़ रसायन युक्त उत्पादों को गले लगा रहे हैं। पहले हमारा स्वास्थ्य अच्छा होता था और आयु लंबी। अब, खेत रासयनिक खाद के हवाले हैं और स्वस्थ्य बौर्नविटा,हॉर्लिक्स और कृत्रिम मिल्क के सहारे हजारों बिमारियों का घर।

अब, हमें जो महसूस हुआ अपना दर्द रख दिया आप सोचें क्या करना है ...............? सरकारें जो करना है करती रहेंगी हमें अपने प्रयास की चिंता होनी चाहिए। हमारे मन में एक जागरूक नागरिक होने का फर्ज पैदा होना चाहिए। हम अपने स्तर से अपने कर्तब्यों का सही निर्वाह करें,। अपने प्रत्येक कार्य पर अपनी दृष्टि ही पैनी रखें।


:-- मोहन ”मधुर”

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