जब मैंने विवादित शाखा का स्थानांतरण करवाया (भाग-2)



इसके पहले भाग में मैंने बताया था कि मेरा पुराने शाखा भवन के पास के मोहल्ले का पहला भ्रमण कैसा रहा।

अब मुझे शाखा के पुराने स्थान के आसपास के लोगों की समझ और गहराई का अंदाज़ा लगने लगा था। मैं यदा कदा शाखा के पुराने स्थल के पास ऋण वसूली फॉलो अप हेतू जाने आने लगा | लोगों की पहचान धीरे धीरे उनकी मानसिकता (मेंटलिटी) और गाँव के लोगों पर किसका कितना दबदबा किसकी कितनी हिममत है इसकी पहचान मुझे होने लगी। अधिक दबदबा वाले लोगों के पास अधिक समय बिताकर अपनी समझ से बैंक के पक्ष के और विरोधियों की पहचान मुझे होने लग गयी थी । हमें शाखा की शिफ्टिंग के उदेश्य की प्राप्ति जो करनी थी।

इसी बीच समय गुजरता गया मार्च क्लोजिंग की तैयारी होने लगी डीडी संबंधी सेंट्रल ऑफिस एकाउंट मिलान(CODD RECONCILIATION) से संबन्धित कार्य के लिए क्षेत्रिये कार्यालय द्वारा ओल्ड रेकॉर्ड की मांग की गयी , जो काफी अनिवार्य था। मैंने अपने स्टाफ को इस रेकॉर्ड के लिए पुराने भवन पर भेजा। स्टाफ वापस आकार बताया कि शाखा भवन के मेन गेट में किसी ने बाहरी ताला लगा दिया है। यह सुनकर मेरा पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया । मेरे मन में एक हथौड़ी की तलाश जगी। किसी ने बताया भाऊचर की सिलाई करनेवाला हथौड़ी है। मैंने अंशकालीन सफाईकर्मी को साइकिल से हथौडी लेकर चलने को कहा | मैं खुद अपनी बाईक पर पीछे अपनी शाखा के गार्ड को बंदूक के साथ बैठाया और चल पड़ा शाखा भवन कीओर। वहाँ पहुँचते ही लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो गयी । मैंने पूछा ये ताला किसने लगाया है? कईबार पुछने पर भी किसी का कोई जबाब नहीं मिला। मैंने नम्रता से कहा यदि लगाए भी हैं तो खोल दीजिये मैं कोई रिपोर्ट नहीं करूंगा , बहुत जरूरी कागजात लेना है। किसी का कोई जबाब नहीं आने पर मैंने सफाईकर्मी से कहा ताला तोड़ों ! तभी भीड से किसी ने कहा -- नहीं ताला मत तोड़ों । मैंने कहा कौन आदमी बोल रहे हैं सामने आइये । सामने आने को कोई तैयार नहीं था। मैंने कहा जो लोग इस का विरोध करना चाहते हैं एक लिखित आवेदन अपने अपने हस्ताक्षर कर के दीजिये। मैं तो ऊपर वालों के आदेश का पालन करने आया हूँ । मुझे कोई सबूत चाहिए कि आदेश के पालन हेतु यहाँ आया और लोगों के विरोध के कारण काम नहीं कर सका। 20-25 लोगों की भीड़ में से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। फिर मैंने कहा अच्छा ऐसा कीजिये मैं ताला तोड़ने का प्रयास करता हूँ आप मेरा हाथ तोड दीजिये या कपार फोड़ दीजिये या किसी प्रकार वार कर मुझे चोटिल कर दीजिये कि मैं ऊपर वाले को सबूत दिखा सकूँ कि मैंने प्रयास किया। फिर भीड़ से आवाज आई तब तो आप केस कर दीजिएगा। मतलब इसके लिए भी वे लोग राजी नहीं हुए । मैंने फिर सफाईकर्मी से ताला तोड़ने को कहा, | सफाईकर्मी अपने स्थान से नहीं हिलना चाह रहा था। मैंने उसके इरादे को भाँप लिया और अब मैंने अपनी बाईक से बैग निकाला उसमे से कागज कलम लेकर उपस्थित लोगों से कहा अच्छा ऐसा कीजिये बताइये आपका नाम क्या है? एक एक कर जब पुछना शुरू किया तो किसी ने नाम नहीं बताया और पीछे मुड़ना शुरू कर दिया। भीड़ छंटनी शुरू हो गयी। मुझे अब अपने कर्मी पर भी विश्वास नहीं था कि मेरे आदेश का पालन निर्भयता से करेगा। मैने वहाँ के लोगों के डरपोक मन की अब पहचान कर ली थी। यह मेरे भविष्य की योजना में काम आने वाला था। मैंने यू टर्न लिया और अपने दोनों स्टाफ को वापस चलने का आदेश दिया। मेरा मन इस हार में भी जीत की खुशी महसूस कर रहा था। क्यूँ कि आगे की योजना सफल होती दिख रही थी। मैंने क्षेत्रिय कार्यालय को इस पूरी कहानी को सूचित कर आगे की योजना पर मनन करना शुरू कर दिया।



मैं गाँव में आना जाना जारी रखा और लोगों मे एक सप्ताह बाद प्रचार करना शुरू कर दिया कि बैंक अब कुछ बड़ा ऐक्शन लेने जा रहा है। गाँव के भ्रमण के साथ ही प्रखण्ड कार्यालय व पुलिस स्टेशन की तरफ सम्पर्क साधना शुरू कर दिया। गाँव में अधिक पूछ वाले लोगों को किसान क्रेडिट कार्ड के नए स्कीम के बारे में जानकारी देते हुए उन्हें आवेदन पत्र के फॉर्म घर घर जाकर बाँट कर इसे अंचल के भूस्वामित्व के साथ प्रखण्ड से अग्रसारित करवाने को कहकर एक लोभ के बंधन मे बांधने लगा। मेरे बार-बार थाना जाने की सूचना गुप्त रूप से मेरे ही कार्यालय से गाँव तक पहुँच रही थी यानि मेरे स्टाफ की गाँव के एक परिवार तक पहुँच होने का लाभ वे लोग उठा रहे थे और गुप्त रूप से मैं भी। ऐसा होने से गाँव वालों के मन में यह ड़र पैदा हो गया कि बैंक द्वारा गाँव के कुछ लोगों पर बैंक मेँ ताला मारने की वारदात को लेकर केस (एफ़आईआर) कर दिया गया है। इसका प्रत्यक्ष लाभ यह मिला कि लोगों द्वारा मारा गया ताला खोल दिया गया, इसकी सूचना गुप्त रूप से मुझे मिल गई।

फिर भी, हमने यह सोचा कि अपना काम ऐसा होना चाहिए कि सफलता मेँ किसी शक की गुंजाइश न हो। मैंने औराई थाना प्रभारी एवं प्रखण्ड के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी से मदद मांगी कि शिफ्टिंग के समय वे उपस्थित रहने की कृपा करें। दोनो पदाधिकारी से अलग अलग मिलकर ब्यक्तिगत अनुरोध मेरे द्वारा किया गया | दोनो ने सहयोग करने से साफ मना कर दिया। उनका कहना था कि बैंक शाखा को 15 किलोमीटर दूर ले गए हैं वहाँ की जनता त्राहिमाम कर रही है और आप हम से ही सहयोग मांग रहे हैं। मैं अपना सा मुंह लेकर वापस आ गया। मन ही मन रास्ता निकालना कठिन लग रहा था। कुछ अंतरंग संपर्क के लोगों से इसपर चर्चा करने पर एक सुझाव मिला वह था राजनेता से थाना प्रभारी एवं प्रखण्ड विकास पदाधिकारी को कहलवाना। मैंने एक परम विश्वस्नीय ब्यक्ति को इस कार्य के लिए ज़िम्मेदारी दी। उनके द्वारा यह कार्य बड़ी निपुणता से पूरा कर लिया गया | उन्होने मंत्री जी का पत्र ही नहीं लाया उस समय नया नया मोबाइल आया था उसको साथ लेकर मेरे साथ चलकर थाना प्रभारी एवं प्रखण्ड विकास पदाधिकारी को मंत्री जी से बात भी करवाया। फिर क्या था दोनो के दोनो पदाधिकारी तुरत तैयार हो गये । बस क्या था मेरा मन गद्द गद्द हो गया।

मैंने अपने अग्रणी बैंक पदाधिकारी को इसकी सूचना दी वे भी गद्द गद्द हो गये। फिर ट्रैक्टर वाले, भारत कौमर्सियल यानि गोदरेज एजेन्सी इत्यादि को संपर्क कर तिथि तय कर लिया। क्षेत्रिए प्रबन्धक को गुप्त रूप से सूचितकर, अपने दल बल के साथ नियत तिथि को बड़े नाटकीए ढंग से एक निश्चित समय पर योजनानुरूप (गुप्त योजना जो ना तो शाखा के स्टाफ को ना इलाके के लोगों को कानोकन पता चल सके) शाखा के पुराने भवन पर अग्रणीबैंक पदाधिकारी एवं शाखा के गार्ड को बैंक से साथ लेकर पहुँच गये। फिर क्या था,पहले की तरह लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। लोगों की बहसबाजी का सामना करने में हमलोग लगे ही थे कि थाना एवं प्रखण्ड विकास पदाधिकारी भी आ गये। पुलिस वालों के एक झडान के बाद सभी की बोलती बन्द हो गयी । कुछ घंटों में हमलोग अपना काम पूरा कर सारे समान, कैशसेफ इत्यादी के साथ नए भवन पर वापस आ गये। शाखा पूरी तरह गड़हाँ चौक पर आ गयी जो अभी भी अमनौर शाखा के नाम से जानी जाती है और मुजफ़्फ़रपुर दरभंगा फोरलेन पर है। एक सप्ताह बाद मेरा प्रोमोशन का पत्र आ गया और उधर गाँव पुनः बाढ़ के पानी मेँ घिर गया।

मेरी पदस्थापना मोतिहारी क्षेत्र के अंतर्गत हो गयी । यह वाकया 2001 का है । जिसके अबतक 20 साल गुजर चुके हैं। बैंक शाखा निर्बाध रूप से गडहाँ चौक पर चल रही है।

इस संस्मरण के माध्यम से मैं यह कहना चाहता हूँ कि कोई भी कार्य असंभव नहीं होता। यदि करने का इरादा पक्का हो साथ ही हिम्मत और मन में उत्साह,लगन और आत्मविश्वास हो। जब कभी गाँव में मेरा जाना हुआ मैंने वहाँ के लोगों का सामना पूरे आत्मविश्वास और दृढ़ता से किया। आज भी इस पूरे घटनाक्रम को याद कर मुझमें नया जोश भर जाता है। मैं सोचता हूँ इस पूरी परिस्थिति का सामना करने में मुझे जरा भी हिचक क्यूँ नहीं हुआ। साथ ही इस पूरी योजना के कार्यान्वयन गुप्त तरीके से नहीं किया जाता तो सफलता संदेहास्पद थी।


:--- मोहन “मधुर”

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