जब मैंने विवादित शाखा का स्थानांतरण करवाया (भाग -1)

Updated: Jan 8


बात उन दिनों की है जब मैं सेंट्रल बैंक के मुजफ्फरपुर क्षेत्र व अंचल की एक छोटी शाखा के शाखा प्रबन्धक के रूप मेँ पदस्थापित हुआ था। बाढ़ से बुरीतरह प्रभावित क्षेत्र में रहने के कारण लगभग छःमाह उस शाखा मेँ आवागमन दुष्कर था। मेरे पूर्व के शाखा प्रबंधक पिछले बाढ़ के समय कुछ चालू लेजर एक आलमारी दो टेबुल कुछ कुर्सियों को एक ट्रैक्टर पर लाद कर 15 किलोमीटर दूर एनएच पर ले आए थे। ग्रामीण क्षेत्र की शाखा 15 किलोमीटर दूर हो जाने से वहाँ की जनता बड़ी कठिनाई महसूस कर रही थी या यूं कहें कि त्राहिमाम कर रही थी,क्यूंकि उस गाँव तक पहुँचने के लिए कोई साधन या सवारी नहीं चलती थी। सड़क पूरे रास्ते मेँ कई कई जगहों पर कटी हुई थी। मेरी पोस्टिंग से पूर्व से ही शाखा का स्थानांतरण एक विवाद का विषय बना हुआ था। आंचलिक कार्यालय के समक्ष धारणा-प्रदर्शन चल रहा था। रोज पेपरबाजी होता थी । यानि यह समाचारपत्रों की सुर्खियों का विषय बना हुआ था। फिर भी प्रबंधन शाखा को पूर्व स्थान पर वापस ले जाने को राजी नहीं था। एनएच पर चलेआने से मेरे मन मेँ इच्छा जगी थी कि मेरे गाँव जाने के रास्ते की शाखा हो गयी,क्यूँ न इस शाखा में अपनी पोस्टिंग का प्रयास किया जाए। बस क्या था हल्के से प्रयास के बाद मेरी पोस्टिंग हो गयी । पर मुझे आगे आनेवाली परेशानी का अंदाजा नहीं था।

मेरी पोस्टिंग जून माह मेँ हुई थी अभी 15 दिन भी नहीं हुए थे कि इलाके मेँ बाढ़ आ गयी | वर्तमान जगह से मात्र चार या तीन किलोमीटर दूर से लेकर शाखा के पूर्व स्थल से 300 मीटर अलग तक पानी ही पानी यानी जलमग्न था। क्षेत्रिये प्रबंधक श्री पी एन पालीवाल का मौखिक आदेश हुआ शाखा का पूरा सामान कैश शेफ सहित प्रेमिसेज खाली करके ले आओ । मेरे लाख समझाने के बावजूद वे मानने को तैयार नहीं थे कि बाढ़ के करण सामान लाना अभी संभव नहीं है। उन्होंने लिखित ऑर्डर जारी किया, जिसमे इस कार्य के लिए समय सीमा निर्धारित की गयी। मेरे लिखित जबाब से भी विश्वस्त नहीं होकर सिकुरीटी ऑफिसर को जांच का आदेश दिया कि सचमुच बाढ़ के पानी फैलने के कारण शाखा के सामानों का स्थानांतरण असंभव है अथवा यह मात्र एक बहाना है । सिकूरिटी औफिसर के जबाब से भी संतुष्ट नहीं होकर खुद शाखा मेँ आकर मेरे विरुद्ध खामियों की पड़ताल करने लगे कि कोईओवर ड्राफ़्ट या लोन खाते मे गड़बड़ी मिले तो हमपर दबाब बनाना आसान हो। पर, मैं खुद फूँक- फूँक कर कदम रखने वाला ब्यक्ति निकला। कोई सुराग हाथ नहीं आया उन्हे। उसके बाद शांत पड़ गए।चूंकि वे बाहर के थे, दरअसल वे समझते थे कि सभी लोकल स्टाफ होने के नाते एक दूसरे का फेवर करते हैं। इसलिए किसी के रिपोर्ट पर विश्वास नहीं हो रहा था उन्हे।

जब बाढ़ का पानी उतरा, आने जाने का रास्ता चालू हुआ, तबतक नवंबर आ चुका था। मैने गाँव मेँ आने जाने की इच्छा जाहिर करते हुए अपनी शाखा के पुराने स्टाफ लोगों मेँ से किसी को साथ चलने के लिए राजी करना चाहा। लेकिन, कोई जाने को तैयार नहीं था। दरअसल हर स्टाफ डरा हुआ था ,क्यूंकि गाँव से आनेवाले ग्राहक उनसे हमेंशा गाँव के लोगों की अभद्र बातचीत की चर्चा करते थे। अतः उन्हें ड़र था कि गाँव (शाखा के पूर्ववर्ती भवन वाली जगह) में जाने पर वहाँ के लोग उनके साथ दुर्ब्यव्हार या बदतमीजी कर सकते हैं। इस डर से इलाके के ऋण की वसूली फॉलो-अप भी नहीं हो पा रहा था। बहुत सोच समझ के बाद मैंने गाँव में अकेला जाने का निर्णय लिया और एक नन बैंकिंग दिवस के दिन मैं शाखा भवन के पास के मुहल्ले में जाकर लोगों से मिलने पहुँच ही गया। बैंक भवन के पास मेरे पहुँचते ही एक दवा दुकानदार कुर्सी निकालकर मुझे बैठने का आग्रह किया। मेरे बैठते ही पूर्व शाखा प्रबन्धक के विरुद्ध शाखा के स्थानांतरण से संबन्धित शिकायतों एवं अपशब्दों का सिलसिला शुरू होकर चलता रहा। धीरे-धीरे मेरे इर्द गिर्द लोगों की संख्या बढ़ती गयी। सभी अपने अपने शब्दों में रोष प्रकट कर रहे थे जिसमें उनके विरुद्ध आपशब्दों का प्रयोग और शाखा को वापस लाने हेतु मुझसे अनुरोध शामिल था। मेरे पास इन सभी विषों के पान के सिवा कोई चारा नहीं था। मैं मुस्कुरा कर इन जहरीली बातों के चुभते तीर को सहन कर रहा था। साथ ही चाय नास्ते भी आ रहे थे। जिसकी मिठास उन विषैली बातों के आगे फीके पड़ रहे थे। मैने जब नजर घूमा कर देखा तो खुद को 20-25 लोगों से घिरा पाया। जब जाने की इच्छा प्रकट की तो जबाब मिला आप अपने क्षेत्रिये प्रबन्धक को अथवा पूर्व शाखा प्रबंधाक को बुलवाएँ तभी आपको हमलोग जाने देंगे।

मैं बिल्कुल घबड़ा नहीं रहा था | मीठी मीठी बातों से सबों को सहला सहला कर हंसा रहा था ताकि माहौल में आत्मिएता बनी रहे । लगभग साढ़े चार घंटे बितने के बाद व कई राउंड चाय की दौड़ समाप्त होने के पश्चात कुछ लोगों के मुंह से आवाजें आने लगी कि अब सर को जाने दो, अधिक देर हो जएगी। लोग धीरे धीरे खुद जाने लगे।फिर, मैं भी वहाँ से चल दिया। यह था मेरा पहला दौड़ा शाखा के पुराने भवन के पास का। ( क्रमशः .....शेष अगले भाग में )


;-- मोहन”मधुर”

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