जब मेरी शिकायत पर प्रखण्ड विकास पदाधिकारी का स्थानांतरण हुआ भाग -2


पिछले भाग में आपने जाना कि प्रखण्ड विकास पदाधिकारी और विधायक मिलकर मुझे अपने चंगुल में फँसाने के लिए मेरे खिलाफ किस प्रकार साजिश को अंजाम दिया।

अब, हमारी बारी थी उस साजिश के चक्रब्यूह को कैसे तोडा जाये। मैंने सोचा प्रखण्ड विकास पदाधिकारी के कारनामों को कैसे उजागर किया जाये । इसके लिए गांवों का चक्कर लगाना और आवेदकों से मिलकर उनके खिलाफ सबूत आवेदन एकत्रित करना इसलिए कठिन था कि हर गाँव और नुक्कर पर विधायक के चमचे और प्र.वि.पदाधिकारी के दलाल मौजूद होते थे। मैंने शाखा के पास लगनेवाले हाट-बाज़ार के पास की चाय नास्ते की दुकान पर बैठ कर उधर से गुजरने वाले ग्रामीणो को पास बुला कर उनसे पूछताछ शुरू कर दी। इस पूछताछ में बहुत से तथ्य सामने आने लगे जिनमें से हर एक को यहाँ बताना मैं उचित नहीं समझता । जिसमें एक ब्यक्ति जो विधायक के लिए काम करता था,उसके बारे में पता चला कि उसने गाँव गाँव में घूम कर किसी से यह कहकर कि इस आवेदन पर हस्ताक्षर करने से मिट्टीतेल मिलेगा, किसी से यह कहकर कि हस्ताक्षर करने पर गेहूं या राशन मिलेगा, लोगों से हस्ताक्षर करवाया है। इसप्रकार ग्रामीणो को झांसे में डालकर मेरे विरुद्ध शिकायत पत्रों पर हस्ताक्षर करवाए गए थे।

मैंने ग्रामीणो द्वारा बताए गए इस प्रकार के और भी तथ्यों की सूची तैयार कर उन लोगों से हस्ताक्षर करवाए जो एक समूहिक कबूलनामे का रूप हो गया साथ ही कुछ लोगों से अलग अलग आवेदन भी संचित कर लिए। इसप्रकार विधायक और प्रखण्ड विकास पदाधिकारी के कारनामों का एक पुख्ता सबूत मुझे प्राप्त हो गया।

अब, इन सबूतों के आधार पर मैंने अपना शिकायत पत्र मुख्य सचिव,बिहार को संबोधित करते हुए प्रतिलिपि जिला पदाधिकारी,पुर्णिया/ अग्रणी बैंक पदाधिकारी पुर्णिया/ अपने क्षेत्रिये कार्यालय,पुर्णिया को भेजा जिसमें शाखा के साथ प्रखण्ड विकास पदाधिकारी के रवैये ऋण आवेदन पत्रों के बेतरतीव प्रेषण से लेकर बीस सूत्री कार्यक्रम की बैठक में हुए वार्तालापों का विस्तृत विवरण था।

कुछ ही दिनो बाद जिला स्तर से डिप्टी कलक्टर ऑफ लैंड रेवेनू (D.C.L.R.) को इस बावत जांच के लिए भेजा गया। उन्होने बैंक एवं प्रखण्ड कार्यालय में आकर विस्तृत पूछ ताछ एवं आवेदन पत्रों से संबन्धित रेकार्डों की जांच की। उसके बाद प्रखण्ड कार्यालय स्तर पर कई बार उनके आने जाने की खबर मिली । फिर कुछ दिनों बाद पता चला कि प्रखण्ड विकास पदाधिकारी का स्थानांतरण हो गया है और वे रिलीव भी हो गए। फिर, एक दिन D.C.L.R.महोदय शाखा में पधारे और उन्होने शाखा प्रबन्धक के चैंबर में मुझे बुलवाया और हमदोनों के समक्ष प्रखण्ड विकास पदाधिकारी के स्थानांतरण की सूचना देते हुए दोनों हाथ जोड़ कर हमदोनों से कहा कि मैं उनकी ओर से माफी मांगता हूँ। आपलोग कृपया अब इस विषय पर कोई पैरवी या रिमाइंडर भेजने का कष्ट न करें। इसकेबाद पुनः बीससूत्री की बैठक हुई उसदिन उन्होने अपनी गाड़ी भेजकर हम दोनों को बुलवाया। बैठक में खुद भी उपस्थित हुए और बैठक में सभी सदस्यों की उपस्थिति में पुनः दोनों हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगते हुए अपने ब्यावहार से हमलोगों को शर्मिंदा कर दिया।

यहाँ इस पूरे उद्धरण से हमें एक बहुत बड़ी सीख मिलती है कि कोई ब्यक्ति पद से बड़ा नहीं होता बल्कि अपने ब्यावहारों से बड़ा होता है। प्रखंड विकास पदाधिकारी प्रखंड स्तर के पदाधिकारी थे और डी.सी.एल.आर महोदय जिला स्तर के पदाधिकारी थे। लेकिन, इनका ब्यवहार इतना उच्च स्तर का हुआ जो दिल को छू गया। वहीं प्रखंड विकास पदाधिकारी का अहंकारी ब्यावहार अपने कार्यालय में ही अनेक विरोधी पैदा कर चुका था। हमें किसी से काम लेना हो तो दिल पर अधिकार जमाएँ न कि दिमाग पर। दिल से जुडने वाला वक्त आनेपर आपके लिए जान भी दे सकता है काम की क्या बात है।

वैसे,गाँववाले और किसान स्वभावतःभोले-भाले होते हैं। अपना मतलब साधने के लिए छुटभैये नेता, दलाल और घूसखोर कर्मचारी उन्हें बरगलाते हैं। यदि उन्हें समझाकर सही तरीके से ऋण दिया जाए तो उनकी स्थिति सुधर सकती है और वसूली में भी सुधार हो सकता है।


:--मोहन”मधुर”

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