“जगाई मेला”और बचपन का संकल्प


बात उन दिनों की है जब मैं छठी कक्षा का विद्यार्थी था। गाँव से लगभग 6 किलोमीटर दूर एक मठ पर मेला लगा था। किसी दो बड़े ब्यक्ति के आपसी बातचीत में ध्यान देने से हम बच्चों को जानकारी हुई,कि मझौली मठ पर मेला लगा है। हमलोगों ने विद्यालय की छुट्टी के बाद मेला घूमने का विचार बनाया | विद्यालय घर से मात्र पाँच मिनट पैदल चलने की दूरी पर था और विद्यालय से बाहर निकलते ही पक्की सड़क थी जिस पर बसें चलती थी। हमलोग विद्यालय के पास बस पर नहीं चढ़ना चाहते थे ताकि कोई शिक्षक,विद्यार्थी अथवा ग्रामीण यह खबर घर तक न पहुंचा दे कि हमलोग बस पर सवार होकर कहीं गए है। यह सोचकर विद्यालय वाले चौराहे से आगे बढ़ गए और वहीं बस का इंतज़ार करने लगे। लेकिन,कई बसें पास करने के बावजूद कोई बस वहाँ नहीं रुकी। हमलोग आगे बढ्ने लगे और जब कोई बस आती दिखती उसको हाथ देते पर बस कहाँ रुकने वाली थी। इसी तरह हाथ दिखाते और बढ़ते मेला स्थल पहुँच गए लेकिन बस की सवारी के बिना ही 6 किलोमीटर। हमसबों की हालत पैदल चलकर खराब हो चुकी थी। क्योंकि हम में से कोई भी कभी इतनी दूर पैदल नहीं चला था।


अब, हमलोग जिस उत्साह से मेला देखने पहुंचे थे वह नहीं रहा। फिर भी हमलोगों ने मेला का आनंद लिया | ऊंचे ऊंचे झूले देखे जलेबियाँ खाई और तरह तरह के खिलौनो की दुकानें एवं खिलौनों को देखा। चूंकि, हमलोग घर में बिना बताए आए थे तो पैसे कहाँ से आते ? किसी के पास थोड़ा बहुत जो पैसे थे, वे जलेबियों में उड़ चुके थे। अब शाम का समय अंधेरे में बदल चुका था। तभी याद आया अरे ! घर भी तो चलना है। किसी तरह मेले की भीड़ से जब बाहर पहुंचे तो सवाल था कि थके हुए हमलोग,यदि बस वाले ने नहीं रोका तो.......? इसी ऊहा पोह में सड़क किनारे खड़े होकर बस का इंतजार करते रहे। बस आई हमलोग जैसे घुसना शुरू किए बस वाले ने कहा रुको रुको! हमलोगों को रोक कर बड़े(युवा,वृद्ध,महिला) लोगों को चढ़ाना शुरू कर दिया और उनलोगों के चढ़ते ही खलासी ने बस बढ़ाने हेतु दरवाजा पीटना शुरू कर दिया। बस आगे बढ़ चुकी थी और हमलोग खड़े एक दूसरे का मुंह देखते रह गए। पैदल चलने की हिम्मत तो थी नहीं। अगले बस के इंतज़ार में वहीं सड़क किनारे खड़े हमलोग एक दूसरे पर दोषा रोपण करते रहे,यह कहते हुए कि उधर से पैदल आने की सलाह देनेवाला कौन था और आनेवाली बस में कैसे घुसेंगे? इन्ही बातों मे हमलोग उलझे थे कि दूसरी बस आ गई। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। देर होने के कारण बस में यात्री कम थे और चढ़ने वाले भी इक्का दुक्का। हमलोग यह सोच रहे थे कि चढ़नेवाले अधिक हों तो उनके भीड़ में बस में घुस जाएँ। क्यूंकि ऐसे तो बस वाले चढ़ाने से रहे ! फिर भी कोशिश तो करना ही था। इसबार हमलोग सफल हुए। बस में घुसते ही जान में जान आई। हमलोग बहुत खुश थे। पीछे की कई सीटें (2-3 सीटों वाली) खाली ही थी। हमलोग चार थे उन्हीं सीटों पर फैल गए। मेला घूमने से ज्यादा खुशी सीटों पर बैठने में मिल रही थी। थके हुए जो थे। तभी उधर से कंडक्टर पैसे वसूल करते हमलोगों के पास पहुंचा। पैसे तो किसी के पास थे नहीं, बचपन में इतना होश कहाँ कि पॉकेट टटोल कर कदम बढ़ाया जाय। हमलोग तो अकस्मात विद्यालय की छुट्टी के बाद साथियों के जोश में निकल गए थे। परिणाम,कंडक्टर ने कहा नीचे उतर जाओ। तभी बगल की सीट से एक बुजुर्ग ने कहा बच्चे हैं रात के आठ बजे हैं उतर के कहाँ जाएंगे? कंडक्टर को अपने कर्तब्य से ऊपर दया का भाव मन में आया और हमलोगों की अटकी साँसों चलने लगी। पहले का एक समय था जब कोई विचार हीनता का ब्यवहार करता था तो उसे टोकने वाले भी बहुत होते थे। लेकिन, आज समय बहुत बादल चुका है। किसी की गलती के बीच कोई बोलता नहीं जिसका परिणाम है समाज में तरह तरह की बुराइयों ने अपना कब्जा जमा लिया है।

अब बस अगले पड़ाव पर पहुंची जहां बहुत सारे यात्री सवार हुए । कंडक्टर का आदेश हुआ तुमलोग सीट छोड़ कर नीचे बैठ जाओ । अब, हमलोग सीट छोड़ चुके थे और नए यात्री को वह जगह दे दी गई। परंतु, मेरे मन में कुछ सवाल चलने लगे पैसे का न होना, सीट से नीचे उतर कर बैठने का कष्ट झेलना, क्यूंकि चलती बस में सीट के बिना नीचे बैठने में खुद को संभाल पाना कठिन हो रहा था। मैंने अपने साथियों में चर्चा की कि हमलोगों को सीट से क्यूँ हटाया। किसी ने कहा नये यात्री पढे लिखे लग रहे है और अच्छे अच्छे कपड़े पहने हुए है । इसलिए, उन्हें सीट पर बैठाया गया। किसी ने कहा हमलोग बस वाले को पैसे नहीं दिये इसलिए हमलोगों को नीचे बैठा दिया। उसी क्षण मेरा बचपन का संकल्प जागृत हो गया कि मैं भी पढ़ लिख कर बड़ा होऊंगा और अपना जीवन अच्छा बनाकर ऐसा बनूँगा कि बस में कोई मुझे हटाकर दूसरे को नहीं बैठाए बल्कि दूसरे को उठाकर मुझे बैठाया जाए। तब से अपने संकल्प को साकार करने की दिशा में मेहनत करना शुरू कर दिया। यह बिलकुल सही घटना है। जिसने मुझमें परिवर्तन ला दिया और मैं विद्यालय में अपनी कक्षा में प्रथम स्थान लाने लगा। उस मेले का नाम था “जगाई मेला” जिसने सचमुच मुझे जगा दिया।


:-- मोहन”मधुर”


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