# छोटी छोटी मगर काम की बातें #



कुछ बातें ऐसी होती हैं जिस पर हम सामान्यतः ध्यान नहीं देते हैं। लेकिन,वे होती बड़े काम की हैं। मेरे घुटने में लगभग दो माह से दर्द है। पहले हमने सोचा ठंढ का असर होगा ब्यायाम करते करते ठीक हो जाएगा। ब्यायाम के साथ ओमनी जेल दवा का भी उपयोग किया। सप्ताह दो सप्ताह बीते लेकिन कोई सुधार नहीं दिखा तो थोड़ी सिकाई वगैरह भी किया। फिर भी सुधार नहीं। सोचा होमियोपैथ डॉक्टर जिनसे मेरा कुछ और परेशानियों का इलाज़ चलता है, उनसे बताऊंगा। मैंने उनसे बताया और उन्होने कुछ दवाएं दी वे ड़वाइयाँ ऊंचे पावर की थी जिसे दो चार दिन खाकर छोड़ देना था। मन में पूरा विश्वास था ठीक हो जाएगा। निःसन्देह थोड़ा सुधार हुआ लेकिन पूरी तरह नहीं। कल ठंढ अधिक थी तो फिर दर्द बढ़ा हुआ लगा।

मैंने कहीं देखा था ---- हल्दी, अजवाइन, अदरख, लहसुन सरसोंतेल में कुछ देर पका कर उस तेल से मालिश करने पर लाभ मिलता है। याद आया तो ऐसा ही किया । मालिश के बाद वास्तव में बहुत आराम मिला।

कहने का अर्थ है हमारे घरों में इस तरह के नुस्खे वर्षों से आजमाते और इसी से ठीक होते आ रहे हैं। परंतु,आज के समय में हम इसपर विश्वास नहीं करते। थोड़ी सी परेशानी हुई नहीं कि अंग्रेजी दवाओं की खोजमें लग जाते हैं। अंग्रेजी दवाओं के सेवन से हमें अनेक प्रकार के साइड इफेक्ट से भी गुजरना पड़ता है। फिर भी बहुत ही आवश्यक स्थिति में जब कोई उपाय नहीं दिखता या क्रीटिकल बिमारियों में अंग्रेजी दवाओं का सेवन जरूरी हो जाता है।

आयुर्वेदिए दवाएं भी कम काम की नहीं होती। वैसे, बहुत से लोगों को बाबा रामदेव के बारे में उल्टी सीधी बातें करते सुना है। लेकिन,सोच कर देखें तो उन्होने बहुत थोड़े समय में जो देश और दुनिया को दिया है वह निकट के बीते 100 वर्षों में किसी और से प्राप्त हुए नहीं जाना जाता। उन्होने आयुर्वेद के टिमटिमाते दीपक को तेल बाती से भर कर पूर्णतया प्रकाशमान बनाने का काम किया है,ऐसा कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

मैं एक ऐसी महिला को जानता हूँ जिन्हें तीन बार दिल का दौड़ा पड़ा, पक्षाघात (लकवा) तक हुआ उनके चेहरे का आकार तक बिगड़ गया लेकिन उनके परिवार के लोग क्रिटिकल स्थिति में ही अङ्ग्रेज़ी दवाओं का सहारा लेते थे। क्रीटिकल स्थिति से निकलने के बाद पुनःहोमियोपैथी के द्वारा ही इलाज़ कराते रहे। जबकि पहला दिल का दौड़ा 18-19 वर्ष की अवस्था में पड़ा था। आज उनकी उम्र 68-70 वर्ष हो चुकी है। पक्षाघात के बाद चेहरा जो टेंढ़ा हो गया था, मुँह नहीं खुलता,भोजन चबाया नहीं जाता था सारी समस्याएँ ठीक होकर चेहरे का आकार पुनः पहले की तरह हो गया। यह सुधार मात्र एक से डेढ़ साल के इलाज़ से हो गया। वहीं मेरी जानकारी में निकट के लोगों में एक ऐसी मौत भी है जो गठिया के इलाज़ के क्रम में इंजेक्शन देते के साथ हो गई। थोड़ी सी लापरवाही से अपने एक संबंधी के बच्चे की दोनों आँखों के कॉर्निया का ट्रांसप्लांटेशन करवाने की नौबत आते देखा है।

परंतु, इसका मतलब यह नहीं कि हम अंग्रेजी दवाओं से डरते रहें। लेकिन, इलाज़ के क्रम में हमारी सतर्कता जागरूकता बहुत मायने रखता है। हमें चिकित्सक और पैथ दोनों के चुनाव में सतर्कता बरतनी चाहिए।

अभी हमारे सामने कोरोना का असुर मुँह फैलाए खड़ा है। हमारी सतर्कता, सावधानी और स्वविवेक ही हमारे मित्र हैं। कोरोना काल की भयावहता दुनिया को बहुत बड़ा सबक सिखला दिया है। इसलिए सतर्क रहें! सावधान रहें! कोरोना नियमों की अनदेखी ना करें ! सोशल दिस्टेंसिंग का पालन,सैनिटाइजर एवं मास्क का उपयोग कदापि न भूलें।


:--- मोहन "मधुर"

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