गौतम बुद्ध जब बुद्धत्व प्राप्त कर घर लौटे



जिस रात बुद्ध ने अपना घर परिवार छोड़ा था उस रात उनका पुत्र राहुल मात्र एक दिन का बच्चा था। उनके दिल में बहुत पहले से यह विचार पल रहा था कि आज छोड़ें कल छोड़ें इसी बीच उनके पुत्र राहुल का जन्म हुआ। अब उनके मन में ऊहापोह की स्थिति चलने लगी कि एक दिन का बच्चा है इसे छोड़ कर जाऊँ तो कैसे जाऊँ यह तो मेरे बहिर्गमन के मार्ग में एक बाधा आ गया। इसलिए उन्होने राहू-केतू के भाव से इस बच्चे का नाम राहुल रखा था। जैसे राहू को चंद्रमा के रास्ते का बाधा माना जाता है। उन्होने इसे अपने मार्ग के बाधे की सोच के कारण उसका नाम राहुल रखा था। उस रात जब निकलने लगे तो सोचा राहुल का मुंह देखकर जाऊँ । लेकिन, जब उन्होने राहुल के पास जाना चाहा तो देखा यशोधरा कमरे में राहुल को अपनी छाती से लगाए सोयी थी। उन्होंने सोचा मैं पास जाता हूँ तो यशोधरा जग जाएगी और रोना चिल्लाना शुरू कर देगी। फिर मेरा निकलना मुश्किल हो जाएगा। इस विचार के कारण और पास जाकर बेटे का मुंह न देख सके और कमरे के द्वार से ही वापस हो गए। उनके मन में घर छोड़ने के क्रम में तरह तरह के विचार तो चल ही रहे थे कि बेटे को केवल माँ के भरोसे छोड़ कर भाग रहा हूँ। अकेली बेसहारा स्त्री पर बेटे का बोझ छोड़ना पड़ रहा है। इसके जन्म में तो मेरा भी तो बराबर का हाथ है फिर भी इसे अकेली माँ के भरोसे छोड़ रहा हूँ इत्यादि इत्यादि। अनेक शंकाएँ उनके मन में चलना स्वाभाविक था। इसलिए ही उसका नाम राहुल रखा था उन्हों ने कि जब मैं घर छोड़ कर जा रहा हूँ तो बाधक बन कर मेरा मार्ग रोकने आ गया ।



बारह वर्षों बाद जब बुद्धत्व को प्राप्त कर वे घर लौटे तो राहुल 12 वर्ष का था। यशोधरा बहुत नाराज़ थी। भला हो भी क्यूँ नहीं। कोई पिता अपने एक दिन के बच्चे को माँ के भरोसे बेसहारा छोड़ कर जाता है क्या? उन्हें देख यशोधरा ने बुद्ध से कुछ नहीं कहा। ब्यंग्यात्मक रूप से राहुल से कहा बेटा! ये तेरे पिता हैं जब तुम एक दिन के थे तब तुम्हें अकेला मेरे भरोसे छोड़ कर चले गए थे । आज बारह वर्षों बाद घर लौटे हैं। तू मुझसे पूछता था न कि कौन हैं मेरे पिता? देख यही हैं तेरे पिता। ये भगोड़े हैं आज बारह वर्षों बाद आए हैं । क्या ठिकाना आज के बाद फिर इंन से कब मिलना हो? आज तुम माँग ले अपने जीने के लिए वसीयत । इनका कोई ठिकाना नहीं कब फिर चले जाएँ और फिर आयें या न आयें। यशोधरा बुद्ध से बारह सालों तक अलग रहने का जो विषपान किया था उसके प्रतिशोध की ज्वालामुखी से धधक रही थी। वह ज्वालामुखी जो बारह वर्षों से उसके अंदर ही अंदर धधक रही थी उसके फूटने का आज समय आ गया था। लेकिन, अगले ही पल जो हुआ उसकी कल्पना तो यशोधरा ने की ही नहीं थी। बुद्ध ने कहा बेटा ! मेरे पास तुझे देने के लिए तो कुछ है ही नहीं सिर्फ इस भिक्षापात्र के। तू ले इस भिक्षा पात्र को मैंने जो पाया है वही तो मैं तुझे दूंगा। तू पकड़ इसे और चल मेरे साथ । अब, यशोधरा की आँखों से आँसू आने लगे । उसने कहा आपने ये क्या कर दिया? बुद्ध ने कहा मेरे पास जो संपत्ति है वही तो इसे दे सकता हूँ। मेरे पास तो यही भिक्षापात्र, सन्यासी रूप और समाधी ही तो संपत्ति है जिसे मैंने अर्जित किया है! यशोधरा यह सुन वह बेचैन होकर फूट फूट कर रोने लगी। वह करे भी तो क्या करे पहले तो सिर्फ पति ही सन्यासी हुए अब पुत्र भी भिक्षापात्र लेकर उनकी राह पर चल पड़ा। वह बारह साल का बच्चा अपने पिता को कहे तो क्या कहे वह नन्हा सा बालक सन्यासी के जीवन के बारे में उसे क्या पता? वह सन्यस्त हो गया। अगले ही क्षण बुद्ध ने कहा - यशोधरा अब रोने से क्या होगा राहुल तो अब सन्यस्त हो गया। मेरे संपत्ति का अब तू भी हिस्सेदार बन जा जो मैंने पाया है उसमें तेरा भी हिस्सा है। तू भी इस सन्यासी जीवन का हिस्सेदार बन जा। यह सुन यशोधरा बुद्ध के चरणों में गिर गई और बुद्ध से कहा भगवन मुझे दीक्षा दें। बुद्ध ने उसे भी अपना शिष्य बना लिया और कहा - हमारा घर आने का मकसद पूरा हुआ। यशोधरा दीक्षा लेने के बाद उन बौद्ध सन्यासियों में इस प्रकार खो गई कि इसके बाद बौद्ध साहित्य में यशोधरा का कोई जिक्र नहीं मिलता। उसने कभी बुद्ध के सन्यासियों में अपना ऐसा कोई अधिकार नहीं दिखाया कि उसका कोई विशिष्ट स्थान होना चाहिए क्योंकि वह बुद्ध की पत्नी है। वह आम सन्यासियों की तरह ऐसे खो गई कि वह कैसे जीवित रही कैसे उसकी मृत्यु हुई इसका कोई उल्लेख नही मिलता। यह यशोधरा की महानता ही थी कि उसने अपने आपको बुद्ध की पत्नी होने के नाते कोई विशेष दर्जा पाने का हकदार नहीं माना और बौद्ध भिक्षु धर्म का दिल से पालन करते हुए अपने को भिक्षुओं के बीच खो दिया।


इस कहानी का अभिप्राय यही है कि पति के बताए मार्ग पर चलना पत्नी का और पिता के बनाए मार्ग पर चलना पुत्र का कर्तब्य होता है, जिस कर्तब्य का पालन यशोधरा और राहुल ने किया। हमारे पुराने ग्रन्थों में ऐसी अनेक कथाएँ मिलती हैं जिससे इसप्रकार की सिक्षा मिलती हैं। परन्तु, आज के जमाने में इन विचारों को महत्व देने वालों की महान कमी हो गयी है। जिससे हमारे समाज में विभिन्न प्रकार की विषमताएँ और विकृतियाँ पैदा होती जा रही हैं। जिसके कारण हमारे परिवार और समाज आज विकट परिस्थितियों से गुजर रहे है। हमें अपने प्राचीन मूल्यों को समझने की जरूरत है जिसे अपनाकर हम अपने परिवार और समाज के मूल्यों को पुनर्स्थापित कर सकें।


:--- मोहन”मधुर”



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