महिलाओं के कामकाजी होने में समस्याएँ



हमारे देश में कामकाजी (सक्रिय) महिलाओं की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। पहले तो महिलाओं की सक्रियता फिल्मों और टी वी शृंखलाओं (सीरियल्स) में देखे जाते थे। परन्तु, पिछले लगभग एक डेढ़ दशक से हम महिलाओं को आगे बढ़ाने में पुरानी विचार धारा को बदलते देख रहे हैं। विचारधारा के बदलाव के साथ ही महिलाएं बड़ी तेज गति से प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं और उनमें यह बदलाव इसलिए गति पकड़ रहा है क्यों कि उन्हें सदियों से दबा कर रखा गया है। यह एक प्राकृतिक सिद्धान्त है कि किसी भी वस्तु को हम जितना दबाएँगे उसे ढीला छोड़ते ही वह तेज गति से भागने की कोशिश करेगा। आप पानी के बहाव को देखें,लोहे के स्प्रिंग को देखें या आदमी या जानवरों की भीड़ को देखें। उसको थोड़ी देर दबा कर या जबरन रोक कर, घेर कर रखें जैसे ही आप उसे ढीला छोड़ेंगे या थोड़ा रास्ता देंगे वह अपनी राह चौड़ी बनाते चला जाएगा और इतना अधिक वेग से भागेगा कि उससे पहले वह कभी इतनी गति नहीं पकड़ा होगा। आज नारी शक्ति का यही हाल है। हम जहां भी नज़र दौड़ाएँ राजनीति का क्षेत्र हो,खेल का मैदान हो,पढ़ाई की बात हो, शिक्षक की नौकरी हो, रेलवे की नौकरी हो, सेना की नौकरी हो,विमानो के पायलॉट हों, चिकित्सा का क्षेत्र हो, बैंकिंग ब्यावस्था हो, या बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सेवाएँ हों, देश के अंदर या अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सेवाएँ हों। हमारे देश की महिलाएं अपने इन किसी भी प्रकार के अवसर पर पीछे नहीं हैं |


हम यदि सोच कर और थोड़ा पीछे मुड़ कर देखें तो महिला उत्थान की दिशा में पूरे देश के अन्य राज्यों अथवा केंद्र की योजनाओं की तुलना में बिहार की नितीश कुमार की सरकार ने अग्रणी भूमिका निभाई है। जितना अग्र सोची कार्यक्रम या योजनाएँ बिहार में लागू हुई उतना पूरे देश में कहीं नहीं हुआ। या यूं कहा जाय कि महिला उत्थान की दिशा में बिहार ही पूरे देश का पथ प्रदर्शक रहा है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसा मैं किसी राजनैतिक चश्में से देखकर नहीं कह रहा हूँ। नितीश सरकार ने ही सर्व प्रथम शिक्षामित्र योजना अंतर्गत शिक्षक की बहाली में , स्वास्थ्य विभाग में आशा कार्यकर्ता की बहाली में,जीविका कार्यक्रम में महिला स्वयं सहायता समूह द्वारा महिला उत्थान, विद्यालय की छात्राओं को साईकिल देकर पढ़ाई के प्रति लड़कियों को प्रेरित एवं प्रोत्साहित करना, पुलिस की नौकरी में, विधानसभा में महिलाओं की अधिक सहभागिता के प्रति सोच और इन सभी अवसरों में महिलाओं को समुचित स्थान देकर उनके सम्मान एवं मनोबल को बहुत आगे बढ़ाया है। यहाँ तक कि महिलाओं में बढ़ता आत्म विश्वास उन्हें ब्यावसाय के क्षेत्र में भी ले आया है।


लेकिन, इन सब के बावजूद महिलाओं की घरेलू या पारिवारिक समस्याओं में कमी नहीं आई हैं। उन्हें अपने जॉब या ब्यावसाय के साथ साथ घरेलू कार्यों एवं बच्चों की ज़िम्मेदारी भी संभालने पड़ते हैं। जिससे उनके जीवन में पारिवारिक असहजता और कटु ब्यावहारों का सामना करना पड़ता है। हम महिलाओं को समान अधिकार देने की बातें कर कहीं पारिवारिक असंतोष पैदा कर उन्हें नफरत की आग में तो नहीं धकेल रहे हैं! इसपर भी हमें विचार करना होगा। कानून हमें न्यायालय में फैसला दिला सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में सहजता समाज में सोच बदलने के बाद ही प्राप्त हो सकती है। अभी हाल मे एक समाचार अखबार में पढ़ने को मिला कि एक राज्य के किसी महिला मंत्री के साथ उनके परिवार वालों का ब्यावहार अच्छा नहीं रहने के कारण उन्हें कठिन परिस्थिति में जीना पड़ रहा है। एक समाचार कुछ ऐसा ही बहुराष्ट्रीय कम्पनी के सीईओ जैसी बड़ी हस्तियों के हवाले से पढ़ने को मिला।


इन सब बातों के क्रम में मुझे दो वर्षों पूर्व की एक ओंखों देखी समस्या याद आ रही है। मैं अपनी बेटी के पासपोर्ट की स्थिति पता करने थाने पर गया था। वहाँ एक युवक और एक लड़की (युवती) को देखा वे दोनों थाने पर अपनी शिकायत लेकर आए थे। वे दोनों भाई बहन थे। उनका कहना था कि उनके पिता की मृत्यु हो गई है वे अपनी माँ के भाई यानि मामा से प्रॉपर्टि में हिस्सा चाहते हैं जिसके कारण वे लोग हम सबों के साथ गाली-गलौज, मार-पीट कर घर से निकालने पर उतारू हैं। इस शिकायत को थानेदार लेने से कतरा रहे थे। कह रहे थे ये आपका पारिवारिक मामला है आपस में मिल बैठ कर सुलझा लीजिये। कहने का मतलब है कि न्यायालय और कानून फैसला दे देते हैं लेकिन उसको अमल में लाना सबसे अहम सवाल हो जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण पाये जाते हैं जिसमें न्यायालय के फैसले के बावजूद फरियादी को हक नहीं मिल पाता। यदि मिलता भी है तो लंबी अवधि बीतने के बाद,जो किसी काम का नहीं रह जाता।


इसलिए सारे नियम, कानून, न्यायालय, सफलता बेकार है, जबतक पारिवार, समाज और मन मस्तिष्क मेँ शांति न हो। कितने भी ऊंचे पद पर हम आसीन हो जाएँ मानवीय मूल्यों के बिना हम सफल समाज और सफल जीवन की परिकल्पना नहीं कर सकते। हमें मूलतः मानवीय मूल्यों को समझना होगा और उसे दिल से स्वीकार भी करना होगा। जाति भेद, धर्म भेद, लिंग भेद इन सभी से परे होकर मानवता का मूल मंत्र हमें अपनाना आवश्यक है। आम सोच में मानवता की भावना ही महिलाओं या समाज के किसी भी उपेक्षित वर्ग को असहज स्थिति से बाहर लाने में कारगर हो सकता है।


:-- मोहन ”मधुर”

97 views4 comments