एक बचपन ऐसा भी



एक बचपन ऐसा भी


बचपन के दिन एक तरफ

कितने हसीन होते हैं,

दिल में खुशियाँ—

और मन में सपने रंगीन होते हैं।

दोस्तों की मजलिस में—

हँसने हँसाने की धुन,

मन ही मन गुन-गुनाने,

बिंदास हँसने खिलखिलाने की धुन।

कल्पनाओं की उड़ान—

चाँद और तारे तोड़ लाने की धुन।

ना कोई मंजिल, ना कोई सीमा—

वर्षा के पानी में घंटों नहाना,

मनमर्जी से चलने के--

ढेढ़ों बहाना ।

ना कोई डर ना कोई चिंता।

वो दरिया का पानी—

वो कागज की नाव,

दूसरी तरफ......

बचपन के जीवन के --

कठिन चढ़ाव ।

अंधेरी रातों में—

तारों का गिनना।

पछुवा हवाओं में—

पैरों का फटना और

खून का रिसना !

ढिबरी में पढ़ना--

और बालों का झुलसना।

दादा की कविता,

माँ की चिता--

और माँ की कहानी।

जब आती हैं —

बचपन की यादें पुरानी,

बहता है आँखों से—

झर्झर पानी।

न आना ओ ! बचपन फिर से हमारे,

अब का ये जीवन दिल से पुकारे !

अब का ये जीवन ........


:--- मोहन ”मधुर”

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