आज की नारी




आज की नारी

झुकी झुकी सी नज़रें,

पलकें उनींदी सी,

बोझिल सी है गर्दन तेरी !

शर्मों हया के बोझ से....

क्यूँ लदी है तू ?

तू तो है नए युग की नारी !

जहां नारी एक चिंगारी है ,

एक नहीं तू -

सौ पुरुषों पर भारी है।

हर रोज बदलती दुनिया में-

पुरुषों से कम तू नहीं रही,

हिम्मत में या शक्ति में –

या देवों की भक्ति में,

हर जगह तुम्हारी ही जय है!

शिक्षा हो या सुरक्षा हो,

चाहे वतन की रक्षा हो !

खेतों मेँ खलिहानों मेँ,

खेलों के मैदानों में—

या सरगम की तानों में !

फिल्मों की अदाओं में-

या गृहिणी की वफाओं में !

भाई की राखी में तुम —

और पत्नी के मुस्कानों में ।

हर जगह तुम्हारी ही जय है....

हर जगह तुम्हारी ही जय है!


:-- मोहन “मधुर”

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