आइये, हम अपनी भावनाओं को संयमित करें


मैंने कहीं पढ़ा था, हमारे विचार कैसे होने चाहिए? हमारे अंदर चार प्रकार के भाव रहने ही चाहिए। वे भाव हैं :--

1. सबों के प्रति मैत्री भाव ।

2. दीन-दुखियों के प्रति दया भाव ।

3. लोगों को सत्कर्म करते देख सुखी भाव।

4. दुष्टों के प्रति उपेक्षा का भाव।

इन भावों को समयानुसार यानि वैसी परिस्थिति आने पर प्रदर्शित ही नहीं करें, उसे अपने अन्तःकरण से स्वयं द्वारा हमें महसूस भी करना चाहिए। यानि,यदि कोई विषय सुखकर हो तो उसके प्रति अनुकूल भाव धारण कर मित्रवत भाव प्रदर्शित करना, उसी प्रकार यदि भावना का विषय दुःखकर हो तो उसके प्रति हमारा अन्तःकारण करुणापूर्ण हो। यदि वह कोई शुभ विषय हो तो हमें आनंदित होना चाहिए तथा अशुभ विषय होने पर उसके प्रति उदासीन रहना ही श्रेयस्कर है। इन सभी विभिन्न विषयों के प्रति मन के इस प्रकार विभिन्न भाव धारण करने से मन शांत हो जाएगा। मन की इसप्रकार से विभिन्न भावों के धारण करने की असमर्थता ही हमारे दैनिक जीवन में अधिकांश गड़बड़ी और अशांति का कारण है। मान लें किसी ने हमारे साथ कोई अनुचित ब्यावहार कर दिया तो हम तुरत उसका प्रतीकार करने को उतावले हो जाते हैं। यह बदला लेने की भावना ही यह दिखलाता है कि हम अपने मन को शांत या संयमित रख पाने में असमर्थ हो रहे हैं। यह भावना एक तरंग के रूप में प्रवाहित होता है और हम अपने मन की शक्ति खो देते हैं। हमारे मन में घृणा या दूसरों के अनिष्ट करने की प्रवृत्ति के रूप में जो प्रतिक्रिया होती है उससे मन की शक्ति का ह्रास होता है। दूसरी ओर यदि इसप्रकार की परिस्थिति में दूसरों के दमन या अनिष्टकारी प्रवृत्ति के जन्म लेने से रोका जाए तो उससे शुभंकारी शक्ति उत्पन्न होकर हमारे ही उपकार के लिए संचित रहती है। ऐसी कोई बात नहीं कि इसप्रकार बरते गए संयम से हमारी कोई क्षति होती है। बल्कि इससे तो हमारा आशातीत उपकार ही होता है। जब कभी हम घृणा या क्रोध की स्थिति पर अपना नियंत्रण करते हैं,तभी वह हमारे अनुकूल शुभ-शक्ति के रूप में संचित होकर उच्चतर शक्ति में परिणत हो जाती है।

यदि हम किसी पहाड़ की गुफा में बैठ कर भी कोई बुरा चिंतन कारें,किसी के प्रति घृणा का भाव पोषित करें,तो वह भी संचित रहेगा और एक समय बाद फिर हमारे ही पास आकर हमें वृहत क्षति पहुंचाएगा। यदि हम अपने हृदय से बाहर चारों तरफ ईर्ष्या और घृणा के भाव भेजें तो वह चक्र वृद्धि ब्याज के साथ आकर हमें हानि पहुंचाएगा। इसप्रकार के प्रवाह को दुनिया की कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती ।

अतः हमें अपनी सोच, अपने विचारों से ईर्ष्या, घृणा, क्रोध व बदले की भावनाओं को त्याग कर अपने ब्यवहार पर सम्पूर्ण नियंत्रण रखना प्रकृति और सृष्टि ही नहीं अपितु अपने भविष्य और अपने संस्कारों की रक्षा के लिए भी नितांत आवश्यक है। नीति शास्त्र कहता है,किसी के भी प्रति घृणा मत करो, सबसे प्रेम करो । जिसप्रकार विदयुत-शक्ति के बारे में कहा जाता है कि डायनेमो से बाहर निकलने के बाद घूमकर फिर उसी यंत्र में लौट आती है। उसीप्रकार,प्रेम और घृणा के बारे में भी यही नियम लागू होता है।

शायद अब, हम यह समझ गए हैं कि अपने नकारात्मक विचारों,ब्यवहारों और आचरण ही नहीं सोच को भी क्यों संयमित करें साथ ही अपनी सोच और विचारों की पवित्रता बनाए रखना हमारे लिए कितना जरूरी है ?


:--- मोहन ”मधुर”

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